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अध्याय 5 · वर्तमान संविधान और दार्शनिक आधार

प्रस्तावना

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भारतीय संविधान की प्रस्तावना राष्ट्र के मुख्य सिद्धांतों और इसके लोगों के लक्ष्यों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। यह कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं है, परंतु एक मार्गदर्शक प्रलेख (guiding document) के रूप में कार्य करती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना का प्रारूप 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) पर आधारित है, जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार और प्रस्तुत किया गया था। उनके शब्दों में, यह उद्देश्य प्रस्ताव “एक संकल्प से कहीं अधिक था। यह एक घोषणा, एक दृढ़ निश्चय, एक प्रतिज्ञा, एक उपक्रम और हम सभी के लिए एक समर्पण" था। इसे 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा द्वारा अंगीकार किया गया था।

प्रस्तावना संविधान के वास्तविक उद्देश्य को धारण करती है। 'प्रिएम्बल' (Preamble) शब्द का अर्थ "भूमिका, प्राक्कथन या प्रारंभिक वक्तव्य" है, जो उत्तर लैटिन के 'प्रिएम्बुलस' (praeambulus) से आया है, जिसका अर्थ है "आगे चलना"। विशेष रूप से यह किसी विधि या प्रस्ताव का प्रारंभिक अनुच्छेद होता है, जो उसके बाद आने वाले अंशों के कारण और मंतव्य को स्पष्ट करता है।

किसी संविधान की प्रस्तावना मात्र एक परिचय से कहीं अधिक होती है। यह उस आधारशिला के रूप में कार्य करती है जो संपूर्ण प्रलेख के सार को परिभाषित करती है। यह शासन के ढांचे, मूल मूल्यों और उन दार्शनिक सिद्धांतों को व्यक्त करती है जो राष्ट्र की पहचान और उसकी आकांक्षाओं को आकार देते हैं। अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण, प्रस्तावना को चुनौती से परे होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि इसका अधिकार अनुल्लंघनीय और इसके सिद्धांत सत्य होने चाहिए। संविधान के किसी भी भाग को प्रस्तावना के विपरीत होने की अनुमति देने से आंतरिक विसंगतियां उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे राज्य का कानूनी और नैतिक ढांचा दुर्बल हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि प्रस्तावना लोकतंत्र, न्याय या स्वतंत्रता जैसे आदर्शों को स्थापित करती है, तो बाद में किसी भी धारा द्वारा इन प्रतिबद्धताओं को न्यून नहीं होने देना चाहिए। यह सामंजस्य सुनिश्चित करता है कि संविधान राष्ट्र की स्थापना की परिकल्पना की एक एकीकृत अभिव्यक्ति बना रहे।

भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना

प्रस्तावना — अध्याय 5

भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना इस प्रकार थी:

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक; स्वतंत्रता, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता; प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की अखंडता सुनिश्चित कराने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर ; अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

यह संविधान 'लोकप्रिय संप्रभुता' की अवधारणा को अपनाता है, यह पुष्टि करते हुए कि राज्य की शक्ति लोगों में निहित है। यह सिद्धांत प्रस्तावना के प्रथम शब्दों "हम, भारत के लोग" से ही स्पष्ट हो जाता है। तथापि, भारत के लोगों ने इस प्रस्तावना को अपनाने के लिए कभी प्रत्यक्ष रूप से मतदान नहीं किया । इसकी शुरुआत "हम, संविधान सभा के सदस्य" से होना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है क्योंकि इस शासन प्रणाली के चयन के लिए कभी कोई जनमत संग्रह (referendum) नहीं किया गया ।

प्रस्तावना संवैधानिक अखंडता की आधारशिला है। यह संविधान के स्वर और ध्येय को निर्धारित करती है, एक लक्ष्य वक्तव्य (mission statement) की भांति कार्य करती है जो अन्य सभी प्रावधानों की व्याख्या और अनुप्रयोग का मार्गदर्शन करती है। यह प्रलेख की वैधता के लिए अंतिम संदर्भ बिंदु है। संविधान के भीतर कोई भी विचलन इसकी संरचनात्मक अखंडता को क्षति पहुँचाएगा, जिससे एक खंडित प्रणाली उत्पन्न होगी जहाँ अलग अलग सिद्धांत प्रभुत्व के लिए संघर्ष करेंगे। यदि प्रस्तावना में परिवर्तन की आवश्यकता हो, तो यह केवल किसी एक बहुमत वाली पार्टी द्वारा नहीं, बल्कि एक सामान्य जनमत संग्रह के माध्यम से होना चाहिए।

प्रस्तावना — अध्याय 5

संशोधित प्रस्तावना

18 दिसंबर, 1976 को भारत में आपातकाल के समय, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने भारत के संविधान के 42 वें संशोधन के माध्यम से कई परिवर्तन किए। प्रस्तावना में "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए और "राष्ट्र की एकता" वाक्यांश को बदलकर "राष्ट्र की एकता और अखंडता" कर दिया गया। इस संशोधन का उद्देश्य समाजवाद और पंथनिरपेक्षता को मौलिक सिद्धांतों के रूप में भारतीय राज्य की प्रतिबद्धता के रूप में रेखांकित करना था।

संशोधित प्रस्तावना

भाग दो: यूरोपीय विचारों की आलोचना