अध्याय 6 · यूरोपीय विचारों की आलोचना
प्राथमिक आलोचना
भारत का संविधान 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है। नवंबर 1949 तक इस पर 165 दिनों से अधिक समय तक चर्चा हुई और इसमें 7635 संशोधनों का सुझाव दिया गया । संविधान सभा ने प्रस्तावना, अनुसूचियों और अनुच्छेदों को अंतिम रूप दिया, परंतु सामान्य नागरिकों के जीवन को प्रभावित करने वाले शेष अधिनियमों (Acts) को यथावत रखा गया ।
संविधान का एक बड़ा हिस्सा 'भारत सरकार अधिनियम, 1935' से लिया गया है, जो औपनिवेशिक भारत का प्रचलित संविधान था । औपनिवेशिक शक्तियाँ मुख्य रूप से अपने व्यक्तिगत, आर्थिक, राजनीतिक या धार्मिक लाभ के लिए अन्य देशों पर अधिकार करती हैं और अपने हितों को स्थानीय निवासियों के हितों के ऊपर रखती हैं । उनका शासन दमन और उत्पीड़न पर आधारित होता है, जिसका उद्देश्य उस देश के संसाधनों का दोहन करना होता है। इन शक्तियों द्वारा बनाए गए नियम और विधि स्थानीय जनता को हाशिए पर रखने और कानूनी ढांचे के भीतर प्रणालीगत उत्पीड़न को समाहित करने के लिए रचित होते हैं । ये नियम सुधार या प्रगति के बजाय दंड का भय उत्पन्न करने के लिए होते हैं । हमारे कितने ही स्वतंत्रता सेनानियों ने इन क्रूरताओं को झेला, फिर भी हमारे संविधान सभा के प्रतिष्ठित विधिवेताओं इन नियमों और विधियों पर पुनर्विचार नहीं किया ।
आज भी भारत में कई ऐसे अधिनियम प्रचलन में हैं जो ब्रिटिश काल के हैं, जिनमें से कुछ में तो 'ईस्ट इंडिया कंपनी' और 'महामहिम रानी' (Her Majesty) जैसे संबोधनों का उल्लेख करते हैं । :
हाल ही में 'भारतीय दंड संहिता' (IPC), 1860 को 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' द्वारा और 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम', 1872 को 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 ' द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है। तथापि, ये परिवर्तन भी सतह स्तर पर ही हैं और इन्होंने भारतीय परंपराओं के अनुसार मूल दर्शन को नहीं बदला है।
विधिवेता अभिनव चंद्रचूड़ ने अपने लेख में उल्लेख किया है कि संविधान इतना विस्तृत इसलिए हुआ क्योंकि इसमें बिजली पर कर न लगाने (अनुच्छेद 287 ) और अधीनस्थ न्यायिक सेवा में न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 234) जैसे तुच्छ विवरण भी सम्मिलित थे । सेठ गोविंद दास और लक्ष्मीनारायण साहू जैसे विचारकों ने भी इसे अत्यधिक भारी और अन्य संविधानों का "खिचड़ी" या "मिश्रण" (cocktail) कहा है, जिसके बारे में आशंका थी कि यह लागू होने के शीघ्र बाद विफल हो जाएगा ।
डॉ बी आर अंबेडकर ने स्वीकार किया कि संविधान में प्रशासनिक विवरण अधिक हैं, परंतु उन्होंने तर्क दिया कि भारत में 'संवैधानिक नैतिकता' (constitutional morality) की कमी के कारण इसकी आवश्यकता थी । उन्होंने इसे एक ऐसी संस्कृति माना जिसे "विकसित" करना होगा क्योंकि लोकतंत्र भारतीय मिट्टी पर केवल एक ऊपरी परत (top-dressing) की भांति था । वास्तविकता यह है कि संवैधानिक नैतिकता को संविधान में ही निहित होना चाहिए । जब लोगों को संविधान में सत्य और वास्तविकता के साथ संरेखित दार्शनिक आधार मिलते हैं, तो उनमें नैतिकता का भाव स्वतः जागृत होता है। बिना नैतिकता के, अधिकारी अपने करियर को प्राथमिकता देते हैं, व्यापारी केवल लाभ पर ध्यान देते हैं और शिक्षित वर्ग अपने लाभ के लिए ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं ।
प्राचीन भारत में गणराज्य 'गण' या 'संघ' के रूप में ज्ञात थे, जहाँ शक्ति निर्वाचित अधिकारियों और लोकप्रिय सभाओं के माध्यम से लोगों में निहित थी । लिच्छवी, शाक्य और मल्ल इसके प्रमुख उदाहरण थे । डी आर भंडारकर के अनुसार, गणराज्य और महासंघ का अर्थ सुव्यवस्थित और संगठित पुरुषों का समूह था ।
नवंबर 1948` में अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि मौलिक विचारों को उधार लेने में कोई शर्म या साहित्यिक चोरी नहीं है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उस समय प्रभावशाली पदों पर आसीन लोग या तो भारतीय ज्ञान से अनभिज्ञ थे या उनके मन में इसके प्रति सम्मान की कमी थी । के। हनुमंतैया ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि प्रारूप समिति के कई सदस्य स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं थे और उनके द्वारा तैयार संविधान में 'भारतीयता' का अभाव था । उन्होंने एक मर्मस्पर्शी बात कही थी: "हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, परंतु यहाँ हमें एक अंग्रेजी बैंड का संगीत मिला है" ।
संविधान ने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड और जापान जैसे देशों से कई अवधारणाएँ उधार ली हैं । अनुच्छेद 14 में "विधियों का समान संरक्षण" अमेरिका से, अनुच्छेद 18(2) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपवाद आयरलैंड से और अनुच्छेद 21 में "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" जापान से ली गई है।
अंततः, भारतीय संविधान को भारत की आशाओं और आकांक्षाओं को साकार करना था, परंतु इसकी प्रस्तावना में प्रयुक्त शब्द "संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य" किसी भी भारतीय ज्ञान या परंपरा से मेल नहीं खाते । न्याय की अवधारणा समाज के लिए आवश्यक है, परंतु हमारी वर्तमान न्याय प्रणाली हमारे भारतीय सिद्धांतों को प्रतिबिंबित नहीं करती । भारतीय दर्शन की 'न्याय' और उसकी ज्ञानमीमांसा (epistemology) पश्चिमी धारणाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ रही है।