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अध्याय 8 · यूरोपीय विचारों की आलोचना

एक परिवर्तित जनतंत्र

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जनतंत्र की अवधारणा का पता प्राचीन यूनान (Greece), विशेष रूप से 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के एथेंस से लगाया जा सकता है। प्राचीन यूनान को व्यापक रूप से जनतांत्रिक शासन का जन्मस्थान माना जाता है। एथेनियन जनतंत्र को प्रत्यक्ष भागीदारी द्वारा परिभाषित किया गया था, जहाँ नागरिक 'एक्लेसिया' (सभा) में एकत्रित होकर विधियों (laws), नीतियों और युद्ध तथा शांति जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों पर मतदान करते थे ।

इसकी मुख्य विशेषताओं में सम्मिलित थे।

1. प्रत्यक्ष जनतंत्र: नागरिकों ने बिना किसी बिचौलिए के विभिन्न विषयों पर सीधे मतदान किया, जिससे शासन में तत्काल प्रभाव सुनिश्चित हुआ। यद्यपि अक्सर यह प्रचारित किया जाता है कि केवल पुरुष सदस्य ही मतदान करते थे, पर यह समझ सही नहीं है। यह मानना अधिक तर्कसंगत है कि एक परिवार का एक प्रतिनिधि इस प्रक्रिया में भाग लेता हो।

2. मताधिकार: मतदान में भाग लेने का अधिकार 20 वर्ष से अधिक आयु के स्वतंत्र पुरुष नागरिकों तक ही सीमित थी, जिससे महिलाओं, दासों और विदेशियों को बाहर रखा गया था । प्रत्येक परिवार का प्रतिनिधित्व उसके प्रतिनिधि के माध्यम से किया जाता था, और कोई दल प्रणाली (Party system) नहीं था ।

3. चयन और चक्रीय व्यवस्था (Sortition and Rotation): कई सार्वजनिक पद चुनाव के बजाय चिट डाल कर भरे जाते थे, और कार्यकाल छोटा होता था, जिससे सत्ता के जम जाने का जोखिम कम होता था और व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहन मिलता था ।

4. छोटा स्तर: लगभग 30,000 पात्र नागरिकों के साथ, एथेंस के छोटे समुदाय ने आमने-सामने विचार-विमर्श और नागरिक जुड़ाव को सुगम बनाया ।

एक परिवर्तित जनतंत्र — अध्याय 8

इस प्रणाली ने नागरिकों के बीच उत्तरदायित्व और स्वामित्व की एक सुदृढ़ भावना को बढ़ावा दिया, क्योंकि वे निर्णयों के लिए सीधे उत्तरदायी थे। तथापि, इसकी विशिष्टता और एक छोटे, समान जनसंख्या पर निर्भरता ने इसे बड़े, अधिक विविध समाजों के लिए अव्यावहारिक बना दिया ।

रोमनों (509-27 ईसा पूर्व) ने जनतंत्र के विचार को और अधिक विस्तारित किया और प्रतिनिधि जनतंत्र के एक रूप की शुरुआत की । इंग्लैंड के 1215 के 'मैग्ना कार्टा' ने राजा की शक्तियों को सीमित करके और प्रजा के लिए कुछ विधिक अधिकार स्थापित करके संवैधानिक शासन की ओर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । पुनर्जागरण और प्रबोधन काल ने जॉन लॉक और मोंटेस्क्यू जैसे दार्शनिकों के कार्यों के माध्यम से जनतांत्रिक आदर्शों को आगे बढ़ाया, जिन्होंने व्यक्तिगत अधिकारों और शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) की वकालत की ।

राजनीति में दल प्रणाली (party system) का विचार 17 वीं शताब्दी में अंग्रेजी गृहयुद्ध के दौरान राजशाही समर्थकों और संसद समर्थकों के बीच संघर्षों में ढूंढा जा सकता है। एडमंड बर्क ने तर्क दिया कि समाज के भीतर विभिन्न हितों और मतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए दल अनिवार्य थे । जेम्स मैडिसन ने राजनीतिक दलों को मतों की विविधता सुनिश्चित करने और किसी एक समूह को प्रभुत्व जमाने से रोकने के लिए एक "आवश्यक बुराई" के रूप में देखा ।

18 वीं और 19 वीं शताब्दी में आधुनिक जनतंत्रों का उदय हुआ । अमेरिकी क्रांति और उसके पश्चात 1787 में अमेरिकी संविधान को अपनाने से नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली के साथ एक संघीय गणराज्य की स्थापना हुई । इसी प्रकार, फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया, जिससे एक गणराज्य की स्थापना हुई । 20 वीं शताब्दी में वि-उपनिवेशीकरण और द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद कई देशों द्वारा जनतांत्रिक प्रणालियों को अपनाए जाने के साथ जनतंत्र का वैश्विक प्रसार देखा गया ।

आधुनिक भारत में जनतांत्रिक व्यवस्था

1947 में अपनी स्वतंत्रता के साथ स्थापित भारत का जनतंत्र एक प्रतिनिधि जनतंत्र के रूप में कार्य करता है जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और बहु-दलीय प्रणाली द्वारा चिह्नित है। इसकी परिभाषित विशेषताओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं:

एक परिवर्तित जनतंत्र — अध्याय 8

11. वंशवादी राजनीति (Dynastic Politics): सत्ता का केंद्रीकरण योग्यता-आधारित नेतृत्व को रोकता है और राजपद को एक फलता-फूलता करियर बना देता है। विधायकों पर कार्यकाल की सीमाएं (term limits) लगाना इसे रोकने का प्रभावी तरीका हो सकता है।

भारत में जनतंत्र के स्वपोषी अथवा स्वार्थी स्तंभ

भारत का वर्तमान संविधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के रूप में तीन स्तंभों का प्रावधान करता है, जबकि प्रसारण (मीडिया) को चौथा स्तंभ माना जाता है।

राजनीतिक नेता (विधायिका) अक्सर अपने विकास कोष का उपयोग अपनी छवि चमकाने के लिए करते हैं और व्यक्तिगत लाभ के लिए कार्यकारी अधिकारियों के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं । कार्यपालिका भी स्वार्थी प्रथाओं का केंद्र बन गई है, जहाँ जवाबदेही के बिना वेतन वृद्धि और अनुबंधों में कमीशन (money flow back) जैसी समस्याएँ व्याप्त हैं । न्यायपालिका अपनी अपारदर्शी कॉलेजियम प्रणाली से प्रभावित है और न्यायिक मामलों के भारी बोझ के कारण न्याय में अत्यधिक विलंब होता है। मीडिया भी सत्य के ऊपर सनसनी और लाभ को प्राथमिकता देने लगा है।

भारतीय जनतंत्र अभी भी क्यों कार्य कर रहा है?

इन चुनौतियों के बावजूद, भारतीय जनता का एक विशाल समूह 'सनातन' दर्शन की आधारशिला पर टिका हुआ है। इसकी स्थिरता के पीछे कुच्छ गिने चुने निस्वार्थ नेताओं का योगदान, सशस्त्र बलों का अराजनैतिक और अनुशासित रुख, ईमानदार अधिकारियों का समर्पण और धर्म के प्रति जनता की निष्ठा है। भारतीय समाज का "वसुधैव कुटुंबकम्" का भाव और लोगों की अनुकूलन क्षमता इसे बिखरने से बचाती है।

निष्कर्षतः, भारत वास्तव में एक गणराज्य नहीं बल्कि एक संशोधित जनतांत्रिक प्रणाली है। इसे अपनी प्राचीन प्रज्ञा के अनुरूप विकसित होने के लिए चुनाव वित्तपोषण में पारदर्शिता और संस्थागत मजबूती जैसे व्यापक सुधारों की आवश्यकता है।