अध्याय 7 · यूरोपीय विचारों की आलोचना
लोकतंत्रात्मक गणराज्य (Democratic Republic)
जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की पांचवीं बैठक की बहस में रिपब्लिक के बारे में कहा था, "भारत में हमारे पास और क्या हो सकता है? राज्यों के पास क्या है या क्या नहीं है, इससे परे भारत को 'गणराज्य' (Republic) के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में सोचना असंभव, अकल्पनीय और अवांछनीय है।" परिणामस्वरूप, भारत प्रतिवर्ष 26 जनवरी को बड़े उत्साह के साथ गणतंत्र दिवस मनाता है, जिसमें सैन्य शक्ति, संस्कृति और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रदर्शन किया जाता है।
हम अपनी प्रस्तावना में दो शब्द देखते हैं: 'लोकतंत्रात्मक गणराज्य' (Democratic Republic)। इस नाम के व्यापक उपयोग के बावजूद, बहुत कम लोग इसके वास्तविक अर्थ को समझते हैं। लोकतंत्र Democracy शब्द का सही अर्थ नहीं है। लोक और लोग शब्द में अंतर है इसका सही अर्थ जनतंत्र है। 'डेमोक्रेसी' (Democracy) ग्रीक शब्द 'डेमोस' (जनता, लोग) और 'क्रेटोस' (शासन) से बना है, जिसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जहाँ शासन लोगों में निहित हो। इस संसार के सभी तंत्र लोक तंत्र हैं क्योंकि ये मानव लोक के तंत्र हैं । गणतंत्र शब्द भी Republic शब्द का सही अर्थ नहीं है, इसका अर्थ है समराज्य । सम राज्य समरसता (harmony) के अनुकूल होता है और समरसता समाज के सही गठन और न्याय से उत्पन्न होती है। गणतंत्र शब्द का सही अर्थ Polity अथवा Oligarchy है, इसका विस्तृत विवरण उत्तरार्ध के एक अध्याय में उपलब्ध है। यहाँ गणतंत्र का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है।
महान यूनानी दार्शनिक प्लेटो की कृति 'द रिपब्लिक' (380 ईसा पूर्व) न्याय, शासन, नैतिकता और एक आदर्श समाज के बारे में गहन प्रश्नों की खोज करती है। यह एक न्यायपूर्ण समाज और एक न्यायपूर्ण व्यक्ति को परिभाषित करने का प्रयास है। यह एक आदर्श 'दार्शनिक-राजा' (philosopher-king) की अवधारणा प्रस्तुत करती है, जिसमें तर्क दिया गया है कि राज्य के प्रशासकों के पास प्रज्ञा, गुण और संसार की गहरी समझ होनी चाहिए। शासन के कई रूप होते हैं; उनमें से कुछ का वर्णन नीचे किया गया है।
प्लेटो के गणराज्य में शासन के रूप और उनकी योग्यता का क्रम:
अभिजाततंत्र (Aristocracy)
सम्मान-तंत्र (Timocracy)
गण तंत्र (Oligarchy)

जनतंत्र (Democracy)
निरंकुश तंत्र (Tyranny)
1. आदर्श राज्य का अभिजात तंत्र - कैलिपोलिस (Kallipolis) प्लेटो का आदर्श राज्य है, जो दार्शनिक-राजाओं द्वारा शासित होता है जिनके पास प्रज्ञा होती है और जो जनहित को व्यक्तिगत स्वार्थ के ऊपर प्राथमिकता देते हैं। इसे 'अभिजात तंत्र' के रूप में भी जाना जाता है। इसमें न्याय के लिए समन्वित एक त्रिवर्णीय संरचना (शासक, रक्षक और उत्पादक) होती है। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए शासकों के पास कोई निजी संपत्ति या परिवार नहीं होता।
2. सम्मान-तंत्र (Timocracy): यह सम्मान प्रिय योद्धाओं द्वारा शासित सरकार है, जो तब उभरती है जब रक्षक प्रज्ञा के ऊपर महत्वाकांक्षा और प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देते हैं। यह सैन्य कौशल और सम्मान को महत्व देता है।
3. गणतंत्र (Oligarchy): यह तंत्र कुछ गिणे चुने प्राभवशाली अथवा धनी लोगों का शासन है, जहाँ शक्ति संपत्ति के स्वामित्व पर आधारित होती है। यह तब उत्पन्न होता है जब शासकों का ध्यान सम्मान से हटकर धन संचय की ओर चला जाता है।
4. जन तंत्र (Democracy): यह लोगों का शासन है, जो तब उभरता है जब निर्धन वर्ग गणतंत्र को उखाड़ फेंकता है और स्वतंत्रता तथा समानता को मूल सिद्धांतों के रूप में स्थापित करता है। इसमें विविधता और व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति प्रमुख होती है। तथापि, अत्यधिक स्वतंत्रता अराजकता की ओर ले जा सकती है और एक एकीकृत नैतिक दृष्टि के अभाव में यह लोकलुभावन नेताओं (demagogues) के बदलाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
5. निरंकुश तंत्र (Tyranny): यह एक अकेले तानाशाह का शासन है, जो तब उत्पन्न होता है जब कोई लोकतांत्रिक नेता या सेना व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए पूर्ण शक्ति हथिया लेती है। यह शासन का निम्नतम स्तर है, जो उत्पीड़न और भय से चिह्नित होता है और न्याय से सबसे दूर है।

प्राचीन भारत की शासन प्रणालियाँ
उपरोक्त की तुलना में भारत में निम्नलिखित प्रणालियाँ थीं: ऐतरेय ब्राह्मण में पांच प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्थाओं का वर्णन किया गया है: साम्राज्य, भोज्य, स्वराज्य, वैराज्य और राज्य।
ऋग्वेद एक राजा के गुणों को इस प्रकार निर्धारित करता है:
स घाराजासत्पतिः शूशुवज्जनोरातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति। उक्थावा योअभिगृणातिराधसादानुरस्माउपरापिन्वतेदिवः ।। (ऋग्वेद 1 ।54।7)
अर्थात्, वह निश्चित रूप से राजा है, जीवन का नियामक है, जो विश्लेषणात्मक प्रज्ञा से आलोकित है और:
(क) सत्पति: सत्य का रक्षक है।
(ख) शूशुवज्जन: स्वयं को विकसित करने में सक्षम व्यक्ति है।

(ग) रातहव्य: त्याग करने वाला है।
(घ) प्रति शासम् इन्वति: नियमों और धर्म का व्यापक रूप से पालन करने वाला है।
(ङ) उक्था अभिगृणाति राधसा: सभी के लाभ के लिए दिव्य निर्देशों का उपदेश देता है।
(च) दानुः अस्मा उपरा पिन्वते दिवः: ईश्वर ऐसे लोगों को उच्च दिव्य ज्ञान प्रदान करता है।
प्रत्येक राजा को 'राजधर्म' का पालन करना होता था; यह शासन का एक समग्र दृष्टिकोण था, जहाँ राजा शासक के बजाय एक 'नियंत्रक' के रूप में कार्य करता था। उसके कर्तव्य—रक्षा, न्याय, कल्याण, नैतिक नेतृत्व और आध्यात्मिक मार्गदर्शन—उसे अपने लोगों की सेवा करने और धर्म को बनाए रखने के लिए बाध्य करते थे। भारत में शासन का सबसे उत्तम रूप 'रामराज्य' के रूप में जाना जाता है। राजपद एक पवित्र उत्तरदायित्व था, जो सद्गुणों और उत्तरदायित्व पर निर्भर था।
एक आदर्श राज्य (Republic), जन तंत्र (Democracy) की तुलना में पूर्णतः भिन्न शासन रूप है। क्या इन दोनों का एक साथ होना संभव है? वैचारिक रूप से, नहीं। यह संभव है कि निचले स्तर पर जन-प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए जनतंत्र हो और उच्च स्तर पर अभिजात राज्य की व्यवस्था हो।
अब देखते हैं कि क्या भारतीय संविधान में आदर्श राज्य की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:
इन विशेषताओं की तुलना करने पर, महिलाओं की भागीदारी को छोड़कर, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भारतीय शासन प्रणाली को वास्तव में एक 'आदर्श राज्य' (Republic) नहीं कहा जा सकता। भारत एक परिवर्तित जनतांत्रिक प्रणाली (modified democratic system) है। जिसे सही अर्थों में पार्टी तंत्र कहा जा सकता है।