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अध्याय 9 · यूरोपीय विचारों की आलोचना

न्याय

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भारतीय संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य सकारात्मक कार्यवाही (affirmative action) और कल्याणकारी नीतियों के माध्यम से जातिगत भेदभाव और असमानता जैसे ऐतिहासिक अन्यायों को संबोधित करना है। भारतीय न्याय प्रणाली, जो जनतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, विलंब, उच्च लागत और उदारता की धारणाओं से घिरी हुई है, जिसमें एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग परिवर्तन का प्रतिरोध करता रहा है। न्याय की इसकी परिभाषा निष्पक्षता का लक्ष्य तो रखती है, परंतु प्रायः वंचित समूहों के लिए अपर्याप्त सिद्ध होती है।

Justice शब्द का सही अर्थ न्याय नहीं धर्म है जो समाज में समरसता स्थापित करता है। Analysis शब्द का सही अर्थ न्याय है। न्याय का अर्थ है ज्ञान प्राप्ति की विधि, न्याय दर्शन भारतीय ज्ञान का एक महत्वपूर्ण दर्शन है।

भारतीय न्यायपालिका एक श्रेणीबद्ध संरचना के रूप में कार्य करती है, जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court), उसके पश्चात उच्च न्यायालय (High Courts) और फिर जिला तथा अधीनस्थ न्यायालय (district and subordinate courts) आते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात 1950 में स्थापित यह प्रणाली ब्रिटिश सामान्य विधि (common law) परंपरा से बनी है, जो पूर्व-दृष्टांतों (precedents) और संहिताबद्ध विधियों पर बल देती है। संविधान के अनुच्छेद 124 -147 सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं, जो इसे संविधान के संरक्षक और मौलिक अधिकारों के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

आधुनिक न्याय प्रणाली (Modern Judicial System)

ऐतिहासिक रूप से, आधुनिक न्याय प्रणाली की जड़ें प्राचीन सभ्यताओं में पाई जाती हैं। लगभग 1 754 ईसा पूर्व में, बेबीलोन में 'हम्मूराबी की संहिता' ने लिखित विधियों और प्रतिशोध पर बल देते हुए प्रारंभिक संहिताबद्ध कानूनी प्रणालियों में से एक की स्थापना की। प्राचीन यूनान में, जनतंत्र के विकास ने 'जूरी ट्रायल' और विधियों के समान अनुप्रयोग की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसने विधि के शासन (Rule of Law) की आधारशिला रखी। रोमन साम्राज्य ने छठी शताब्दी ईस्वी में 'कॉर्पस जुरिस सिविलिस' (Corpus Juris Civilis) के साथ इसे और आगे बढ़ाया, जिसमें कानूनी प्रतिनिधित्व और निर्दोष होने की पूर्व-धारणा (presumption of innocence) जैसे सिद्धांतों को संहिताबद्ध किया गया, जिसने नागरिक विधि प्रणालियों को गहराई से प्रभावित किया।

मध्यकाल के दौरान सामंती और चर्च न्यायालयों का प्रचलन था। इंग्लैंड के 1215 के 'मैग्ना कार्टा' ने यह प्रतिपादित कर एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया कि सम्राट भी विधि के अधीन हैं। 17 वीं-18 वीं शताब्दी के प्रबोधन काल (Enlightenment) ने इन विचारों को और परिष्कृत किया, जहाँ जॉन लॉक और मोंटेस्क्यू जैसे विचारकों ने तर्क, व्यक्तिगत अधिकारों और शक्तियों के पृथक्करण की वकालत की। आज, विश्व भर की न्याय प्रणालियाँ इन ऐतिहासिक प्रभावों को न्याय और निष्पक्षता पर आधारित ढांचों में समाहित करती हैं।

आधुनिक न्याय प्रणाली के मुख्य सिद्धांत

आधुनिक न्याय प्रणाली कई मूल सिद्धांतों पर टिकी है जो इसकी अखंडता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करते हैं:

1. विधि का शासन (Rule of Law): सभी व्यक्ति और संस्थान पारदर्शी और निष्पक्ष विधियों के प्रति उत्तरदायी हैं।

2. न्यायपालिका की स्वतंत्रता: न्यायाधीश बाहरी प्रभाव से मुक्त होकर कार्य करते हैं, जिससे उनके निर्णयों में निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।

3. सम्यक प्रक्रिया (Due Process): कानूनी कार्यवाही निष्पक्षता की गारंटी देती है, जिसमें सुनवाई का अधिकार और अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर सम्मिलित है।

4. निर्दोष होने की पूर्व-धारणा: आपराधिक मामलों में, अभियुक्त तब तक निर्दोष है जब तक दोष सिद्ध न हो जाए।

5. विधि के समक्ष समानता: पद या धन की परवाह किए बिना, सभी को समान कानूनी उपचार और संरक्षण प्राप्त है।

6. मानवाधिकारों का संरक्षण: न्याय प्रणाली स्वतंत्रता और जीवन जैसे मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है।

7. शक्तियों का पृथक्करण: सरकार को कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में विभाजित किया गया है ताकि शासन नियंत्रण और संतुलन बना रहे।

चुनौतियां और आलोचना

एक सुदृढ़ ढांचे के बावजूद, प्रणाली गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है जो इसकी प्रभावशीलता को कम करती हैं। 2015-20125 के वर्तमान आंकड़े इन मुद्दों को रेखांकित करते हैं:

भ्रष्टाचार और न्यायिक अतिरेक (Corruption and Judicial Overreach)

2025 की कुच्छ घटनाओं ने न्यायपालिका की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के आवास पर अघोषित नकदी की बरामदगी और कुछ विवादास्पद निर्णयों ने प्रणालीगत समस्याओं को प्रकट किया है। नकदी बरामदगी के एक महीने बाद भी कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई, जिसे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने "असंवैधानिक उन्मुक्ति" (unconstitutional immunity) कहा, जो संविधान द्वारा केवल राष्ट्रपति और राज्यपालों को प्राप्त है।

न्यायाधीशों को प्राप्त उन्मुक्ति (immunity) उनके उत्तरदायित्व के मार्ग में एक अवरोध बन गई है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, न्यायाधीशों को केवल संसद द्वारा महाभियोग (impeachment) के माध्यम से हटाया जा सकता है, जो एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इतिहास में अब तक किसी भी न्यायाधीश को भ्रष्टाचार के लिए महाभियोग द्वारा पदच्युत या दंडित नहीं किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के 1991 के 'वीरस्वामी निर्णय' ने न्यायाधीशों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाकर इस सुरक्षा कवच को और कड़ा कर दिया है।

न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) के उदाहरणों में अप्रैल 2025 का वह निर्णय सम्मिलित है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर कार्यवाही करने की समय-सीमा निर्धारित की। इसे कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप माना गया। इसी प्रकार 'वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025' पर न्यायालय के स्थगन आदेश ने भी शक्तियों के पृथक्करण पर बहस छेड़ दी है।

अंततः, न्यायपालिका एक शून्य में कार्य नहीं करती; इसका नैतिक दिशा-सूचक व्यापक सामाजिक वातावरण से प्रभावित होता है। जब समाज में भ्रष्टाचार को "चतुराई" माना जाने लगे, तो न्यायाधीश भी इससे अछूते नहीं रहते। 2023 की 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' की रिपोर्ट के अनुसार, 68 % भारतीय न्यायिक भ्रष्टाचार को सामान्य मानते हैं।