अध्याय 10 · यूरोपीय विचारों की आलोचना
स्वच्छंदता, समानता, बंधुता
(Liberty, Equality, Fraternity)
फ्रांसीसी क्रांति काल (1789 -1794 ) तीव्र सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का काल था, जो राजशाही के प्रति व्यापक असंतोष, 'एंशिएंट रिजीम' (Ancien Régime) की कठोर त्रि-स्तरीय वर्ग व्यवस्था में निहित गहरी सामाजिक असमानताओं और भीषण आर्थिक संकट से प्रेरित था। 1780 के दशक के अंत में आर्थिक मंदी और फसल की विफलता के कारण बेरोजगारी इतनी बढ़ गई कि खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगीं, जिससे निर्धन वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ।
वित्तीय समस्याओं के अतिरिक्त, राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अभाव, भाषण और सभा की स्वतंत्रता पर अंकुश और दमनकारी सामंती अधिकारों ने व्यापक असंतोष में योगदान दिया । पारंपरिक संरचनाओं की आलोचना करने वाले प्रबोधन काल (Enlightenment) के विचारों और 'डायमंड नेकलेस' जैसे घोटालों ने भी जनमत बनाने और क्रांतिकारी भावना को प्रेरित करने में भूमिका निभाई । कुलीन और मध्यम वर्ग ने राजा लुई XVI के कमजोर शासन का विरोध किया, जिसमें किसान उच्च करों और सामंती उत्पीड़न से पीड़ित थे, जिससे क्रांति से पहले बार-बार अशांति उत्पन्न हुई ।
1793 तक, क्रांति एक उग्र चरण में प्रवेश कर चुकी थी, जिसे राजा लुई XVI की मृत्युदंड और 'जैकोबिन्स' (Jacobins) के उदय द्वारा चिह्नित किया गया था। जैकोबिन्स फ्रांसीसी क्रांति के दौरान एक उग्र राजनीतिक समूह थे, जिन्हें पेरिस के जैकोबिन मठ के नाम पर जाना जाता था । मैक्सिमिलियन रोबेस्पिएरे जैसे नेताओं के नेतृत्व में, उन्होंने एक गणराज्य की अवधारणा पर बल दिया और क्रांति के कथित शत्रुओं को समाप्त करने के लिए सामूहिक मृत्युदंड का प्रयोग किया । क्रांति को आंतरिक और बाहरी खतरों से बचाने के लिए, उन्होंने नागरिक स्वतंत्रता को निलंबित करने, आतंक का उपयोग करने और 'लोक सुरक्षा समिति' (Committee of Public Safety) में शक्ति के केंद्रीकरण जैसे चरम उपाय लागू किए। इसने भय और दमन का वातावरण निर्मित किया, जिसके बारे में कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि यह पुरानी व्यवस्था की निरंकुशता के समान ही था, जिससे क्रांति की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के साथ विश्वासघात हुआ । अंततः 1794 में उनकी आर्थिक नीतियां और सार्वजनिक असंतोष उनके पतन का कारण बना ।
नारे का विकास (Evolution of the Motto)
क्रांति का प्रसिद्ध नारा, "स्वतंत्रता, समानता, बंधुता", प्रबोधनकालीन दर्शन से उत्पन्न हुआ और आंदोलन का प्रतीक बन गया । इस आदर्श वाक्य को 1848 की क्रांति में पुनर्जीवित किया गया और 1880 में 'तृतीय गणराज्य' के अधीन आधिकारिक रूप से अपनाया गया । 1789 के 'मानव और नागरिक के अधिकारों की घोषणा' ने स्वतंत्रता को इस प्रकार परिभाषित किया: "स्वतंत्रता का अर्थ वह सब कुछ करने में सक्षम होना है जिससे दूसरों को हानि न हो" ।
स्वच्छंदता: दूसरों को हानि पहुँचाए बिना कार्य करने की स्वायत्तता ।
समानता : वर्ण या वर्ग की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार ।
बंधुता: लोगों के बीच एकता और भाईचारे की भावना ।
भारतीय संविधान में इनका समावेश
भारतीय संविधान में उन समस्याओं का सामना किए बिना ही फ्रांसीसी क्रांति के मूल्यों को सम्मिलित कर लिया गया, जिनसे फ्रांसीसी लोग जूझ रहे थे । फ्रांस की प्रथाएं तत्कालीन राजनीतिक और धार्मिक दर्शन के कारण थीं, जो भारत पर लागू नहीं होती थीं । सुशासन का उद्देश्य एक स्थिर, समृद्ध और निष्पक्ष समाज का निर्माण करना है जहाँ नागरिक उन्नति कर सकें ।
स्वच्छंदता (Liberty): एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र राष्ट्र के लिए 'स्वच्छंदता' के नारे का महत्व कम हो जाता है। जहाँ अत्यधिक दमन हो, उन स्थानों पर लोगों को क्रांति की ओर उकसाने के लिए एक महान नारा है। यदि कोई राष्ट्र पहले से ही स्वतंत्र और लोकतांत्रिक है, तो वह पहले से ही जन-केंद्रित है।
संविधान भाषण, धर्म और आवागमन की स्वच्छंदता जैसे मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। ये स्वच्छंदताएँ जॉन लॉक द्वारा प्रतिपादित 'संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा' से ली गई हैं । जॉन लॉक ने माना था कि जन्म के समय मस्तिष्क एक 'कोरी पटिया' (blank slate) की भांति होता है। यह सिद्धांत 'कर्म' और 'पुनर्जन्म' के भारतीय दर्शन के विपरीत है। स्वच्छंदता के इस आदर्श को वशिष्ठ धर्म सूत्र में वर्णित 'शिष्ट' (Śişța) के आदर्श द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। यह वो अंकुश है जो एक व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छा से अपने ऊपर लगता है। वह व्यक्ति 'शिष्ट' वह है जिसका हृदय (स्वार्थी) इच्छाओं से मुक्त है। ऐसे व्यक्ति का व्यवहार 'शिष्टाचार' है, जो सदैव दूसरों का भला करने के लिए तत्पर रहता है।
समानता (Equality): क्रांति के समय फ्रांस में कुलीन और पादरी वर्ग (जनसंख्या का मात्र 2%) व्यापक विशेषाधिकारों का आनंद लेते थे, जबकि शेष 98% जनता भारी करों का बोझ उठाती थी । भारत में समानता के सिद्धांत को अस्पृश्यता के उन्मूलन और भेदभाव निषेध जैसे प्रावधानों में समाहित किया गया है। तथापि, केवल 'समानता' (Equality) पर बल देने से व्यक्तिगत आवश्यकताओं और परिस्थितियों की उपेक्षा हो सकती है। इसके स्थान पर 'न्यायोचित' समता (Equity) के उदाहरण अधिक महत्वपूर्ण हैं, जैसे निर्धन व्यक्ति को निःशुल्क शिक्षा देना या दिव्यांग व्यक्ति के लिए रैंप (ramp) की सुविधा प्रदान करना ।
समानता का विचार निर्जीव वस्तुओं और सजीव प्राणियों पर भिन्न रूप से लागू होता है। निर्जीव वस्तुएं अपने भौतिक गुणों में एक समान हो सकती हैं, परंतु सजीव प्राणी शिक्षण, विकास, प्रेरणा और अनुभवों द्वारा आकार लेने वाली गतिशील इकाइयाँ हैं जो एक दूसरे के समान नहीं होतीं ।
जनसंख्या में प्रज्ञा (IQ) और भावनात्मक प्रज्ञा (EQ) के माप यह दर्शाते हैं कि लोग समझ, व्यवहार, प्रतिभा, गुण या क्षमता में समान नहीं होते । इसलिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की समानता नहीं हो सकती, फिर भी यह अवश्य है कि सभी को शासन में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए । समाज को समान अधिकारों और 'गुण-आधारित व्यवस्था' (meritocracy) के बीच संतुलन बनाना चाहिए जो प्रतिभा को पहचाने और उसे पुरस्कृत करे । किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा उस व्यक्ति की उपलब्धियों, गुणों, प्रतिभा और राष्ट्र के प्रति उसके योगदान के अनुसार होनी चाहिए ।
बंधुता (Fraternity): संविधान राष्ट्र की एकता और अखंडता पर बल देता है और विविध समुदायों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है। बंधुता को एक कानूनी अधिकार के बजाय एक नैतिक दायित्व के रूप में देखना चाहिए । जब लोग दूसरों का भला करते हैं, तब आत्मीयता का वातावरण निर्मित होता है, इसलिए बंधुता को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह लोगों के भीतर से उत्पन्न होती है।