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अध्याय 11 · यूरोपीय विचारों की आलोचना

संप्रभुता (Sovereignty)

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राजनीतिक सिद्धांत में 'राष्ट्र की संप्रभुता' और 'लोकप्रिय संप्रभुता' (popular sovereignty) दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं, यद्यपि सत्ता और स्व-शासन पर उनके साझा बल के कारण कभी-कभी इनका प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है। संप्रभुता का अर्थ है किसी राज्य की स्वयं को आंतरिक और बाह्य रूप से, अन्य संस्थाओं के हस्तक्षेप के बिना शासित करने की सर्वोच्च शक्ति। इसमें राष्ट्र की विधियाँ बनाने, उन्हें लागू करने और अपनी सीमाओं के भीतर स्वतंत्र रूप से अपने कार्यों का संचालन करने की क्षमता सम्मिलित है।

हालांकि संप्रभु शब्द का प्रयोग तो भारतीय संविधान में हुआ है परंतु बिना इस शब्द के विस्तार के । संप्रभु शब्द का मूल शब्द प्रभु जो की ईश्वर के अस्तित्व की ओर इंगित करता है। जैसे ईश्वर जीवन और मृत्यु का संचालन करता है वैसे ही एक राष्ट्र अपने लोगों के लिए एक ईश्वर की शक्तियों, और जनता के प्रति अपने कर्तव्यों जैसे व्यवस्था, न्याय, करुणा, प्रेरणा इत्यादि का प्रतिनिधित्व करे ।

संप्रभुता के आयाम

1. बाह्य संप्रभुता: एक राष्ट्र तब संप्रभु होता है जब वह बाहरी नियंत्रण से मुक्त हो, अर्थात कोई भी विदेशी राज्य या संस्था उसकी नीतियों या कार्यों को निर्देशित नहीं कर सकती। उदाहरण के लिए, 1998 में भारत का परमाणु परीक्षण करने का निर्णय उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों का पालन करने के संप्रभु अधिकार की पुष्टि था।

2. आंतरिक संप्रभुता: राज्य अपनी सीमाओं के भीतर अपने नागरिकों और संस्थानों पर सर्वोच्च अधिकार रखता है और शासन, विधि प्रवर्तन तथा संसाधनों के आवंटन पर नियंत्रण रखता है।

3. लोकप्रिय संप्रभुता इस सिद्धांत को संदर्भित करती है कि राजनीतिक अधिकार का अंतिम स्रोत राष्ट्र के लोग हैं। जनतंत्र में, लोग ही संप्रभु होते हैं और उनकी इच्छा, जो चुनाव या जनमत संग्रह जैसे तंत्रों के माध्यम से व्यक्त होती है, सरकार की शक्ति को वैधता प्रदान करती है।

18 वीं और 19 वीं शताब्दी में लोकतांत्रिक आदर्शों के उदय ने इन दोनों अवधारणाओं को जोड़ दिया। आधुनिक लोकतंत्रों में, राष्ट्र की संप्रभुता प्रायः उन संस्थानों के माध्यम से प्रयोग की जाती है जो लोकप्रिय संप्रभुता को प्रतिबिंबित करते हैं।

जन तंत्र में सत्ता किसकी है?

जन तंत्र (Democracy) शब्द ग्रीक शब्द 'डेमोस' (लोग) और 'क्रेटोस' (शक्ति) से बना है, जो इस विचार पर आधारित है कि सत्ता लोगों में निहित है। ग्रीक पौराणिक कथाओं में, 'क्रेटोस' शक्ति और बल का मानवीकरण है।

जॉन लॉक जैसे दार्शनिकों ने तर्क दिया कि राजनीतिक शक्ति शासित लोगों की सहमति से उत्पन्न होती है और सरकारें केवल लोगों के अनुमोदन के माध्यम से ही वैधता प्राप्त करती हैं। थॉमस पेन और हन्ना आरेंड्ट जैसे विचारकों ने भी लोकप्रिय संप्रभुता और सार्वजनिक मामलों में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया है।

तथापि, व्यावहारिक रूप से आधुनिक राज्यों में निर्वाचित प्रतिनिधि आम तौर पर, असंगत रूप से अधिक शक्ति का प्रयोग करते हैं। यह व्यवहार प्रतिनिधियों और जनता के बीच एक दूरी उत्पन्न करता है, जहाँ निर्वाचित अधिकारी जनहित के ऊपर व्यक्तिगत या दलीय हितों को प्राथमिकता देते हैं।

सामूहिक चेतना के रूप में संविधान

लोकतांत्रिक प्रणालियों में, संविधान लोगों की सामूहिक चेतना की अंतिम अभिव्यक्ति के रूप में कार्य करता है। यह समाज के साझा मूल्यों, सिद्धांतों और आकांक्षाओं को समाहित करता है। यह सुनिश्चित करते हुए कि न तो प्रतिनिधि और न ही संस्थान अपने जनादेश का उल्लंघन करें, संविधान शासन शक्ति की सीमा निर्धारित करता है।

सत्ता किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि संविधान के एकीकृत विचार की होती है, जिसे राज्य के संस्थानों के माध्यम से प्रयोग किया जाता है। जनतंत्र के सही ढंग से कार्य करने के लिए विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और नौकरशाही जैसे सभी संस्थानों का उत्तरदायी और जवाबदेह होना अनिवार्य है। भारत का 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (2005) नागरिकों को सार्वजनिक अधिकारियों से पारदर्शिता की मांग करने की शक्ति देकर इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि सत्ता लोगों की है।

जनतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता की चुनौतियाँ

राष्ट्रीय संप्रभुता को कई आंतरिक और बाह्य दबावों से खतरा हो सकता है। उनमें से कुच्छ निम्नलिखित हैं ।

1. गुटबाजी (Factionalism): विचारधारा, धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर विभाजन, राष्ट्रीय एकता को खंडित करते हैं और बाहरी शक्तियों के लिए इन विभाजनों का लाभ उठाना सरल बना देते हैं।

2. अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विचारधाराएं: शीत युद्ध के दौरान, भारत के कम्युनिस्ट दलों का झुकाव सोवियत संघ की ओर था, जो कभी-कभी भारत के गुटनिरपेक्ष रुख के साथ टकराता था। इसी प्रकार, दक्षिणपंथी दलों के पश्चिमी शक्तियों के साथ जुड़ाव भी स्वायत्तता से समझौता कर सकते हैं।

3. धार्मिक संस्थानों का राजनीतिक दबाव: धार्मिक संगठन सरकारों पर अपनी नीतियों को धार्मिक लक्ष्यों के साथ संरेखित करने के लिए दबाव डाल सकते हैं, जिससे पंथ निरपेक्ष शासन जटिल हो जाता है।

4. जनतंत्र की धीमी कार्यप्रणाली: विचार-विमर्श और आम सहमति पर आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया अक्सर धीमी होती है, जो संप्रभुता के खतरों के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया में बाधा डाल सकती है।

5. सरकार परिवर्तन: चुनावों के कारण सरकार बदलने पर विदेश नीति और रक्षा रणनीतियों में बदलाव आ सकते हैं, जिससे बाहरी खतरों के विरुद्ध एक स्थिर रुख बनाए रखना कठिन हो जाता है।

6. आर्थिक निर्भरता: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे संस्थानों पर निर्भरता संप्रभुता को सीमित कर सकती है, क्योंकि ये संस्थान ऐसी आर्थिक नीतियों को थोप सकते हैं जो राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के ऊपर वैश्विक वित्तीय हितों को रखती हैं।

7. सूचना युद्ध: विदेशी शक्तियां लोकतांत्रिक स्वच्छंदताओं का लाभ उठाकर दुष्प्रचार (disinformation) फैला सकती हैं और राष्ट्रीय एकता को अस्थिर कर सकती हैं।

भारत की संप्रभुता के समक्ष ऐतिहासिक चुनौतियां

1. पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर अधिकार (1947-1949): इसने भारत की क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन किया और एक विवादित सीमा उत्पन्न की। कश्मीर की विशेष स्थिति (अनुच्छेद 370) पर लोकतांत्रिक बहसों ने एकीकृत प्रतिक्रिया में विलंब किया।

2. चीन द्वारा अक्साई चिन पर अधिकार (1950-1962): इसने भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती दी और रक्षा तैयारियों की कमियों को प्रकट किया।

3. विदेशी गुप्तचर और आतंकवादी हस्तक्षेप: पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और गुप्तचर भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन करते हैं। जैसे 2001 का संसद हमला और 2008 के मुंबई हमले, भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन थे।

4. IMF और विश्व बैंक का हस्तक्षेप: 1991 के भुगतान संतुलन संकट के समय, भारत को आर्थिक उदारीकरण की शर्तों पर ऋण लेना पड़ा, जिसने सिद्धांत रूप में भारत की आर्थिक संप्रभुता को सीमित किया।