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अध्याय 25 · शासन की संरचना और प्रणालियाँ

विवेकशील नियंत्रण

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संविधान उन सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए जहां शासन अपनी वैधता (legitimacy) ब्रह्म (universal design) से प्राप्त करती है, अपनी प्रभावशीलता प्रजा की सहमति से प्राप्त करती है, और जिसका अस्तित्व परमार्थ के लिए है। कार्य और कारण (cause-and-effect) के बीच में एक प्राकृतिक संबंध होता है।

'विवेक' वह उच्चतर सार्वभौमिक प्रज्ञा है, जो ब्रह्मांड का आधार है। यह मानवीय मस्तिष्क की तर्क और विश्लेषणात्मक क्षमता की शक्ति है। जिस प्रकार एक व्यक्ति जो अपनी बुद्धि से अपने व्यवहार को नियंत्रित करने और अपने जीवन की योजना बनाने में सक्षम है, वह अधिक सफल होता है, वैसा ही एक राष्ट्र के साथ भी है। यह प्लेटो के 'रिपब्लिक' में वर्णित 'दार्शनिक राजा' या विद्वानों के शासन की अवधारणा का क्रियान्वयन है। चयन (selection) और निर्वाचन (election) दोनों ही लोगों द्वारा सरकार बनाने की प्रक्रियाएं हैं। विद्वान लोगों का चयन उनकी योग्यता, अनुभव, पिछले कार्यों के अनुभव, राष्ट्र के लिए योगदान और व्यापक कल्याण के लिए कार्य करने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए। ये लोग संसद के कार्य निर्वहन के उपयुक्त बनने के लिए आगे का प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।

'विवेक' (Reason) शब्द गतिशील है जबकि 'विधि' (Law) शब्द स्थिर है। 'दंड' (rule) के स्थान पर 'नियंत्रण' (control - विनियमन, प्रवाह) एक बेहतर शब्द है; यह राष्ट्र को उसके लक्ष्यों (पुरुषार्थ, परमार्थ, पराक्रम, परिश्रम और प्रेम) की ओर प्रवाह बनाए रखने का प्रतीक है। इसलिए विवेक के नियंत्रण की प्रणाली दंड के नियमों से श्रेष्ठ है। नियम निर्जीव वस्तुओं के लिए स्थिर होते हैं और सजीवों के लिए गतिशील (दिशानिर्देशों के रूप में) ।

शासन में विवेक के नियंत्रण की जड़ें भारत के इतिहास में बहुत गहरी हैं, जो विशेष रूप से उन राजाओं के इतिहास में दिखाई देती हैं जिन्हें सार्वभौमिक रूप से विद्वान माना जाता था । ये शासक, विवेक और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से निर्देशित होकर, ऐसी अनुकरणीय विरासत छोड़ गए जो ऐतिहासिक वृत्तांतों में आज भी गूंजती है। जब एक शासक का विवेक राजधर्म (नागरिकों का परम कल्याण) से निर्देशित होता है और वे एक कुलपति की तरह कार्य करते हैं, तो शासन प्रणाली आदर्श बन जाती है, चाहे वह राजतंत्र हो या अन्य कोई रूप । राजधर्म प्रजा की रक्षा और सेवा, न्याय और समृद्धि सुनिश्चित करने पर बल देता है, जैसा कि राजा राम जैसे शासकों द्वारा सिद्ध किया गया है। 'रामराज्य' की अवधारणा को अक्सर आदर्श शासन के शिखर के रूप में उद्धृत किया जाता है, जो सभी प्रजा के लिए न्याय, समरसता और कल्याण को समाहित करता है। यह आदर्श केवल एक तक सीमित नहीं है बल्कि राजा जनक, विश्वामित्र, हरिश्चंद्र, बलि, हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त मौर्य, अग्रसेन, भोज, राजराज चोल, अशोक और कृष्णदेवराय जैसे अन्य दार्शनिक-राजाओं के शासन में भी प्रतिबिंबित होता है, जिनमें से प्रत्येक ने विवेक और नीतिशास्त्र द्वारा संचालित शासन के समृद्ध इतिहास में योगदान दिया है।

यहाँ उल्लेखित कुछ राजाओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है:

विवेकशील नियंत्रण — अध्याय 25

राजधर्म या शासक का कर्तव्य, भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक केंद्रीय सिद्धांत है। यह आधुनिक लोकतंत्रों तक भी विस्तारित है; जो नेता विवेक और कर्तव्य भावना से निर्देशित होकर जन कल्याण को प्राथमिकता देते हैं, वे राजधर्म का अनुकरण कर सकते हैं । यह सार्वभौमिकता दर्शाती है कि सरकार की संरचना शासक के इरादों और कार्यों की तुलना में गौण है, जो विवेक के नियंत्रण में निहित हैं ।

विवेक का प्रतिनिधित्व

मानव मस्तिष्क के तीन मुख्य भाग होते हैं: सेरेब्रम (cerebrum), सेरेबेलम (cerebellum) और ब्रेनस्टेम (brainstem) । सेरेब्रम सोचने, समझने, योजना बनाने और भाषा का कार्य संभालता है, और यह बाएं तथा दाएं गोलार्धों (hemispheres) में विभाजित है। बायां गोलार्ध विवेक, विशेष रूप से तार्किक और भाषा-आधारित कार्यों में अधिक सम्मिलित होता है, और यह ऊपर वर्णित 'बुद्धि' से मेल खाता है। दायां गोलार्ध भावनाओं को संभालने की संभावना रखता है और यह 'मन' के अनुरूप है। पीनियल ग्रंथि (pineal gland) को पहचान (identity) का स्थान माना जाता है। विवेक की क्षमता को प्रज्ञावानों के साथ जोड़ा जा सकता है।

वह राष्ट्र जो योग्यता (गुण) को प्रगति का एकमात्र साधन मानता है, एक पंथनिरपेक्ष वातावरण स्थापित करता है। यह प्रज्ञा (wisdom) को पहचाने जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। प्रज्ञा के संकेतक बुद्धि अंक (IQ) और मन अंक (EQ) हो सकते हैं । शोध के अनुसार उच्च IQ और EQ (115-130 और 130-145 के बीच) वाले व्यक्तियों में दूरदर्शी होने, नवाचार करने, वास्तविकता को समझने, समाधान खोजने और संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर नेतृत्व करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।

तर्कसंगत शासन के लिए भारत की संसदीय प्रणाली की पुनर्कल्पना

विवेकशील नियंत्रण — अध्याय 25

एक राष्ट्र को विवेक द्वारा शासित होने के लिए, उसके नियम कठोर शोध और चिंतन से उत्पन्न होने चाहिए, जिन्हें असाधारण बुद्धि और अनुभव वाले व्यक्तियों द्वारा तैयार किया जाए जो व्यक्तिगत या क्षेत्रीय हितों के ऊपर सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता दें । भारत की वर्तमान संसदीय प्रणाली में ऐसे व्यक्तियों की कमी है; सांसद अक्सर कानून बनाने का कर्तव्य नौकरशाहों को सौंप देते हैं और स्वयं कार्यकारी कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं ।

मानव शरीर शासन के लिए एक रूपक प्रदान करता है: संसद बुद्धि (बाएं गोलार्ध) का प्रतिनिधित्व करती है, विधायी अंग मन और भावनाओं (दायें गोलार्ध) का प्रतीक है, और राष्ट्रपति, पहचान के रूप में, विवेक और भावना के बीच संघर्षों का समाधान करते हैं । एक सचिवालय, मस्तिष्क के 'कॉर्पस कैलोसम' (corpus callosum) की तरह, समन्वय की सुविधा प्रदान करता है।

प्रस्तावित संसदीय प्रणाली

प्रस्तावित प्रणाली संसद को विद्वान और उपलब्धियों वाले व्यक्तियों के निकाय के रूप में देखती है।

संसद (विवेक) और विधायिका (भावना) के बीच के विवादों का निपटारा राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा, जो राष्ट्र की पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं । यह मॉडल मानव शारीरिक संरचना और 'सांख्य' जैसे भारतीय दार्शनिक सिद्धांतों को एकीकृत करके नैतिक और प्रभावी शासन का एक दूरदर्शी मार्ग प्रस्तुत करता है।