अध्याय 26 · शासन की संरचना और प्रणालियाँ
जनतंत्र
किसी राज्य में शासन की संरचना उसके लोगों की भावनाओं , उनके मूल्यों और आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए। जन-प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होने से प्रभावी प्रशासन का जन्म होता है। प्लेटो के 'रिपब्लिक' और भारतीय सांख्य दर्शन में वर्णित रचनात्मकता और समग्र सोच—जिसे मस्तिष्क के दाएं गोलार्ध (मन) द्वारा दर्शाया गया है, से प्रेरणा लेते हुए, यह प्रणाली राज्य विधानसभा को शासन के तृतीय स्तर के रूप में स्थापित करती है।
जैसा कि इस अध्याय का शीर्षक संकेत देता है, लोग स्वभाव से रचनात्मक और परिश्रमी होते हैं, और उन्हें अपनी उस ऊर्जा के प्रवाह को बनाए रखने के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली और आधारभूत ढांचे की आवश्यकता होती है। रचनात्मक वातावरण तनावमुक्त होना चाहिए, और इसीलिए राज्य स्तर पर व्यवस्था का लोकतांत्रिक होना आवश्यक है।
इस प्रणाली में, राज्य विधानसभा शासन के एक महत्वपूर्ण स्तर के रूप में कार्य करती है, जो राष्ट्रीय संसद के नीचे स्थित है। यह सभा चुनावों के माध्यम से जनसामान्य की भागीदारी सुनिश्चित करके जनतांत्रिक भावना को साकार करती है, जिसमें राज्यपाल (Governor) संसद के प्रतिनिधि के रूप में इसके संचालन का मार्गदर्शन और निरीक्षण करते हैं। मुख्यमंत्री की तुलना 'ब्रह्मा' से की गई है, जो भारतीय दर्शन में अपनी आकाशगंगा के ब्रह्म का प्रतीक हैं। यह राष्ट्र के ब्रह्मांड के भीतर राज्य को एक आकाशगंगा के रूप में चित्रित करता है। बुद्धि, मन और सामाजिक तत्वों के बीच सामंजस्य के लिए यह रूपक ढांचा आवश्यक है, जो एक संतुलित और प्रतिनिधि शासन संरचना को बढ़ावा देता है।
जनतांत्रिक प्रक्रिया नीचे ग्राम और वार्ड स्तर तक विस्तारित होती है, जहाँ भू- स्तर पर जन भागीदारी और अधिक स्पष्ट हो जाती है। इन स्तरों पर चुनाव स्थानीय विचारों के प्रतिनिधित्व को व्यापक बनाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शासन सामुदायिक आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी बना रहे। यह श्रेणीबद्ध प्रणाली उस आदर्श राज्य के साथ मेल खाती है जहाँ रचनात्मकता, भावनाएँ और समग्र सोच (जो दाएं गोलार्ध के गुण हैं) को एक सहभागी ढांचे में पिरोया जाता है जो लोगों की सामूहिक इच्छा को प्रतिबिंबित करता है।
परिवार का महत्व
परिवार समाज की मूलभूत और एकजुट इकाई है। भारतीय पारिवारिक मूल्यों को ऐतिहासिक रूप से उनकी सुदृढ़ता के लिए सराहा गया है। पैतृक व्यवस्था का प्रचलन उपयोगी और तार्किक था, जिसे अक्सर आधुनिकता और सूचना के अभाव के कारण अक्सर गलत समझा जाता है। पूंजीवाद और वैश्वीकरण के उदय ने पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था को प्रभावित किया है, जिससे पैतृक मानदंडों में बदलाव आया है।
विदेशी प्रचार अक्सर नारीवाद (feminism) को एक ऐसे सांस्कृतिक तत्व के रूप में प्रस्तुत करता है जो पारंपरिक प्रणालियों को समाप्त कर देता है, जिससे परिवारों की एकजुटता पर प्रभाव पड़ता है। यह तनाव एक ऐसे शासन मॉडल की आवश्यकता को रेखांकित करता है जो आधुनिक आर्थिक वास्तविकताओं और पारंपरिक मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करे।
प्रस्तावित विधानसभा एक ऐसा ढांचा प्रदान करती है जो लोकतांत्रिक आदर्शों को भारतीय संस्कृति के परिवार-केंद्रित लोकाचार के साथ जोड़ता है। आपराधिक गतिविधियों का समर्थन करने वाले परिवारों को सार्वजनिक भूमिकाओं से बाहर रखने जैसी नीतियों के माध्यम से, यह शासन में उस स्थिरता को पुन: स्थापित करने का प्रयास करता है जिसे व्यक्तिवादी लोकतांत्रिक प्रणालियों में अनदेखा कर दिया जाता है। मुख्यमंत्री की 'ब्रह्मा' के रूप में भूमिका लोगों के सार्वभौमिक मन का प्रतिनिधित्व करने की प्रणाली दार्शनिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जबकि राज्यपाल का निरीक्षण राष्ट्रीय उद्देश्यों के साथ संरेखण सुनिश्चित करता है। यह प्रणाली परिवार और शासन संरचनाओं के भीतर लैंगिक समानता को बढ़ावा देकर पारंपरिक मूल्यों को उनके मूल सार को खोए बिना विकसित कर सकती है। पूर्वी समाजों में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहे विस्तारित पारिवारिक व्यवस्था का उपयोग सामुदायिक उदारता को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
मताधिकार
आधुनिक लोकतंत्र 'सार्वभौमिक मताधिकार प्रणाली' पर टिका है, जो प्रत्येक व्यक्ति को उसकी सामाजिक स्थिति या योगदान की परवाह किए बिना समान मतदान अधिकार प्रदान करता है। तथापि, इस प्रणाली की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह ऐसे परिणामों को जन्म दे सकती है जहाँ अल्पज्ञानी मतदाता, लोकलुभावन आंदोलन या जन सांख्यिकीय रणनीतियाँ राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकती हैं। यह समानतावादी आदर्श, अपनी सादगी में आकर्षक होते हुए भी, योग्यता, उत्तरदायित्व और सामाजिक योगदान में असमानताओं को ध्यान में रखने में विफल रहता है। क्या एक अपराधी के राजनीतिक प्रभाव को कानून की रक्षा करने वाले एक अधिकारी के समान मानना न्यायसंगत है? ऐसी समानताएँ व्यक्तिगत योगदान की उपेक्षा करके न्याय की अवधारणा को कमजोर करती हैं।
सार्वभौमिक मताधिकार प्रणाली की मुख्य कमियाँ निम्नलिखित हैं:
भारित मताधिकार प्रणाली (Weighted Franchise System)
एक भारित मताधिकार प्रणाली व्यक्ति के सामाजिक योगदान को प्रतिबिंबित करने वाले वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर मतदान क्षमता प्रदान करती है। इसके संभावित मानक निम्नलिखित हो सकते हैं:
इसका क्रियान्वयन एक स्वतंत्र आयोग द्वारा प्रबंधित पारदर्शी ढांचे के माध्यम से होना चाहिए। भ्रष्ट गणतंत्र (oligarchy) को रोकने के लिए प्रति व्यक्ति अधिकतम वोटों की सीमा निर्धारित की जा सकती है।
मतदान भार गुणांक की एक प्रस्तावित तालिका (Ad-hoc Matrix)
योग्यता
विवरण/आयु
अंक (Points)
आयु
< 25 वर्ष
0
> 25 वर्ष
1
> 50 वर्ष
5
> 75 वर्ष
10
पारिवारिक स्थिति
परिवार का मुखिया
परिवार के सदस्यों के वोटों के योग के बराबर
शिक्षा
< 10वीं
0
> 10वीं
1
स्नातक (Graduate)
3
स्नातकोत्तर (PG)
5
पी एच डी (PhD)
10
करदाता
कोई कर नहीं
0
< 5 लाख
1
> 5 लाख
2
> 1 0 लाख
5
> 1 00 लाख
1 0
> 1 000 लाख
20
पुरस्कार
राज्य स्तरीय
1
राष्ट्रीय
5
शीर्ष राष्ट्रीय (पद्म आदि)
1 0
अंतर्राष्ट्रीय
1 0
वीरता पुरस्कार
1 0
शीर्ष वीरता पुरस्कार
20
सामाजिक सेवा
> 5 वर्ष
1
> 1 0 वर्ष
3
> 20 वर्ष
5
> 30 वर्ष
1 0
सैन्य सेवा
> 5 वर्ष
1 (अग्निवीर)
> 1 0 वर्ष
3
> 20 वर्ष
5
> 30 वर्ष
1 0
राजनीतिक दल और निर्वाचन प्रणालियाँ
समाज विभिन्न पंथों, वर्गों व जातियों में बंटा हुआ है। राजनीतिक दलों के उदय ने इस विभाजन में एक नई परत जोड़ दी है, अब ये पार्टियों में भी बाँट गया है । पार्टियां निश्चित 'वोट बैंक' सुरक्षित करने के लिए समाज का ध्रुवीकरण करती हैं। समय के साथ, दल अनौपचारिक समूहों से बदलकर कार्यालयों और बैंक खातों वाले औपचारिक संस्थानों में विकसित हो गए हैं। दलों के औपचारिक होने से भ्रष्टाचार भी सामान्य हो गया है, जहाँ वे अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए अवैध माध्यमों से धन जुटाते हैं। 2019 में राजनीतिक वित्तपोषण का 75% धन अज्ञात स्रोतों से आया था।
औपचारिक राजनीतिक दलों को समाप्त करना इन समस्याओं का एक संभावित समाधान है। दलीय संरचनाओं के बिना, उम्मीदवार दलगत निष्ठा या पहचान की राजनीति के बजाय व्यक्तिगत योग्यता और नीतिगत आधारों पर प्रतिस्पर्धा करेंगे। यह वोट-बैंक प्रणाली को समाप्त कर, अधिक सार्थक राजनीतिक विमर्श को जन्म देगा। भारत की संसद में दलीय संघर्षों के कारण उत्पादक घंटों में 26% की गिरावट देखी गई है। ऐतिहासिक रूप से, जॉर्ज वाशिंगटन ने भी अपने विदाई भाषण (1796) में विभाजनकारी "दलीय भावना" के विरुद्ध चेतावनी दी थी और गुटबाजी के ऊपर एकता की वकालत की थी।
निरंतर निर्वाचन प्रणाली (Continuous Election System)
पारंपरिक समयबद्ध (periodic) चुनावों के स्थान पर, एक निरंतर निर्वाचन प्रणाली होनी चाहिए, जहाँ प्रत्येक माह एक या अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हो। यह प्रणाली चुनावी गतिविधियों को समय के साथ वितरित कर देगी, जिससे राष्ट्रव्यापी अभियानों से जुड़ी सामाजिक उथल-पुथल को रोका जा सकेगा। यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि राजनीतिक शक्ति गतिशील बनी रहे और किसी एक समूह का प्रभुत्व जमने का जोखिम कम हो। इसके साथ ही, निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए एक 'कार्यकाल-आधारित प्रणाली' (tenure-based system) होनी चाहिए जो निरंतर चुनावी चक्रों के बीच स्थिरता प्रदान करे। निश्चित कार्यकाल लंबी अवधि की नीति नियोजन और कार्यान्वयन को सक्षम बनाते हैं।
निष्कर्षतः, राजनीतिक दलों का संस्थानीकरण जनतंत्र को विभाजन और भ्रष्टाचार के खेल में बदल देता है। निरंतर और क्रमिक चुनावों वाली एक गैर-दलीय प्रणाली शासन को दलीय हितों के ऊपर प्राथमिकता देने का एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान करती है। जैसा कि थॉमस जेफरसन ने चेतावनी दी थी, "यदि हमें अज्ञानता से बचना है और स्वतंत्र रहना है, तो हमें लोगों के सामूहिक विवेक पर भरोसा करना चाहिए, न कि गुटीय एजेंडों पर।"