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अध्याय 24 · शासन की संरचना और प्रणालियाँ

राष्ट्र का अस्तित्व

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राष्ट्रीय शासन दार्शनिक सिद्धांतों और व्यावहारिक प्रशासन के बीच एक परस्पर जटिल क्रिया है जो किसी राष्ट्र के अस्तित्व और उसकी वैधता को परिभाषित करते हैं। नीतिगत विखंडन और अविश्वास के इस युग में, शाश्वत वैदिक सिद्धांत पुरुष (ब्रह्मांडीय चेतना) और प्रकृति (भौतिक वास्तविकता) के माध्यम से शासन एक ऐसा समग्र मॉडल प्रस्तुत करते है जहाँ राष्ट्र का संवैधानिक लोकाचार (पुरुष) और उसके भौतिक संसाधन (प्रकृति) उसकी संप्रभुता, अस्तित्व और धर्म को बनाए रखने के लिए सामंजस्य स्थापित करते हैं।

इस ढांचे के केंद्र में पांच दार्शनिक-नेताओं की एक राष्ट्रपति परिषद है, जो योग्यता-आधारित राष्ट्रपति सचिवालय का नेतृत्व करती है। इसे निरंतरता, उत्तरदायित्व और ब्रह्मांडीय संरेखण को संतुलित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। आधुनिक शासन कला के साथ वैदिक दर्शन का संश्लेषण करके, यह प्रणाली सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठती है, निरंकुशता को कम करती है और शासन को शाश्वत सत्य में स्थापित करती है।

पुरुष और प्रकृति

ब्रह्मांड दो मूलभूत शक्तियों द्वारा संचालित है: पुरुष (सार्वभौमिक चेतना) और प्रकृति (गतिशील भौतिक क्षेत्र)। शासन के संदर्भ में, पुरुष राष्ट्र के अपरिवर्तनीय नैतिक केंद्र, उसके संविधान, विधियों और दार्शनिक आदर्शों को समाहित करता है। जिस प्रकार आत्मा शरीर का मार्गदर्शन करती है, पुरुष शासन के लिए नैतिक दिशा-सूचक प्रदान करता है। भारत की संवैधानिक प्रस्तावना पुरुष के आधुनिक भाव के रूप में पुरुषार्थ, परमार्थ, पराक्रम, परिश्रम और प्रेम जैसे कालजयी आदर्शों का आह्वान करती है।

इसके विपरीत, प्रकृति राष्ट्र का प्रत्यक्ष शरीर है, इसके लोग, भूमि, जैव-विविधता और संसाधन। जहाँ पुरुष शाश्वत सत्य है, वहीं प्रकृति विकासशील है, जिसके लिए अनुकूल नीतियों की आवश्यकता होती है। यह द्वैत भगवद गीता (7.4-5) के इस कथन को प्रतिबिंबित करता है कि भौतिक संसार (प्रकृति) सृष्टि का गर्भ है, जो दिव्य इच्छा (पुरुष) द्वारा आकार लेता है। साथ मिलकर वे एक सहजीवी संबंध बनाते हैं; संविधान (पुरुष) राज्य के भौतिक कार्यों (प्रकृति) का मार्गदर्शन करता है, जिससे ब्रह्मांडीय व्यवस्था (ऋत) के साथ संरेखण सुनिश्चित होता है।

अहंकार: राष्ट्रीय पहचान 'भारत'

यह मॉडल राष्ट्रपति परिषद और राष्ट्रपति सचिवालय के माध्यम से संचालित होता है, जो राष्ट्र की पहचान, उसके अहंकार को साकार कर इसके अस्तित्व को सुनिश्चित करते हैं। संस्कृत में 'अहंकार' का अर्थ "स्वयं -पहचान" या "मैं" का भाव है। इस संदर्भ में, अहंकार राष्ट्रीय पहचान है, जिसका नाम "भारत" है, जो राष्ट्र के सामूहिक स्वरूप और सत्य तथा ज्ञानोदय की ओर उसकी आकांक्षा का प्रतीक है। यह पहचान स्थिर नहीं है बल्कि विकसित होती है, जो राष्ट्र की दार्शनिक और अस्तित्वगत यात्रा को प्रतिबिंबित करती है।

राष्ट्रपति परिषद (Presidential Council)

इस प्रणाली के शिखर पर राष्ट्रपति परिषद स्थित है, जो धर्म, शासन कला और विज्ञान के ज्ञाता पांच विद्वानों का एक निकाय है। प्लेटो के 'दार्शनिक-राजाओं' के प्रतिरूप पर आधारित, उनका अधिदेश राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करना, महत्वपूर्ण संस्थानों (रक्षा, न्यायपालिका, विदेश नीतियों ) की देखरेख करना और यह सुनिश्चित करना है कि शासन भारतीय दर्शन पर आधारित संविधान के अनुरूप हो।

मुख्य विशेषताएं:

राष्ट्रपति सचिवालय के कार्य: सचिवालय प्रशासनिक और रणनीतिक कार्यों में परिषद की सहायता करता है:

राष्ट्रीय संप्रभुता (National Sovereignty)

राष्ट्रीय संप्रभुता राष्ट्रीय पहचान की आधारशिला है, जो बाहरी हस्तक्षेप के बिना स्वयं को शासित करने के राष्ट्र के अधिकार को व्यक्त करती है। यह राष्ट्र की 'स्वतंत्र इच्छा' (free will) की भांति है। व्यष्टि-समष्टि सिद्धांत के माध्यम से देखे जाने पर, संप्रभुता केवल राजनीतिक अधिकार से ऊपर उठकर ब्रह्म का प्रतिबिंब बन जाती है।

एक संप्रभु राज्य केवल अपनी स्वतंत्रता का दावा ही नहीं करता, बल्कि वह ब्रह्मांडीय व्यवस्था या सार्वजनिक कल्याण के माध्यम से "ईश्वर की इच्छा" और अपने नागरिकों की आकांक्षाओं को जोड़ता है। आज के युग में परस्पर जुड़े हुए विश्व में, एक राष्ट्र पर्यावरणीय स्थिरता या मानवाधिकारों जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों के साथ संरेखित होकर अपनी संप्रभुता को सुदृढ़ कर सकता है।

प्राचीन भारत में राजा धर्म का पालन करते थे जो प्रजा को अपनी संतान समझ न्याय और सामाजिक संतुलन बनाए रखता थे। संप्रभुता, जब सार्वजनिक सामंजस्य से जुड़ती है, तो अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी बन जाती है। इस सिद्धांत पर विन्यासित राष्ट्र वास्तव में संप्रभु है, जो अपने शासन और कार्यों में धर्म को प्रतिबिंबित करता है।