अध्याय 14 · प्लेटो का गणराज्य (Plato's Republic)
आदर्श राज्य (The Republic)
भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को एक आदर्श राज्य (Republic) के रूप में सारांशित करती है, और राष्ट्र प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को बड़े उत्साह के साथ 'गणतंत्र दिवस' मनाता है। न तो भारत एक Republic में वर्णित आदर्श राज्य है और न ही इतिहास में वर्णित गणराज्य । लेकिन रिपब्लिक की अवधारणा को समझने के लिए हम संविधान में प्रचलित गणराज्य शब्द का ही प्रयोग करेंगे ।
यह समझना अनिवार्य है कि वास्तव में रिपब्लिक क्या है। 'गणराज्य' शब्द के बीज 1947 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत "उद्देश्य प्रस्ताव" (Objectives Resolution) के माध्यम से बोए गए थे। इन उद्देश्यों में से सबसे पहले यह लिखा था – “[…] भारत को एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य (रिपब्लिक) घोषित करना।” नेहरू का विचार था कि स्वतंत्रता के पश्चात रिपब्लिक के रूप में विकसित होना भारत के लिए एक स्वाभाविक प्रगति थी। वह इस विषय पर भी स्पष्ट थे कि हम जो भी शासन प्रणाली स्थापित करें, वह हमारे लोगों के स्वभाव के अनुरूप होनी चाहिए और उन्हें स्वीकार्य होनी चाहिए।
बेंजामिन फ्रैंकलिन के प्रसिद्ध शब्द फिलाडेल्फिया सम्मेलन के अंतिम दिन कहे गए थे, जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया था। 17 सितंबर, 1787 को लेडी एलिजाबेथ विलिंग पॉवेल ने बेंजामिन फ्रैंकलिन से पूछा, "डॉक्टर, हमें क्या मिला है — एक रिपब्लिक या एक राजतंत्र?" फ्रैंकलिन ने उत्तर दिया, "एक रिपब्लिक – यदि आप इसे बनाए रख सकें।" विश्व के कई देशों के आधिकारिक नामों में " रिपब्लिक" शब्द सम्मिलित है। कुछ ऐसे देश जिनके आधिकारिक नामों में " रिपब्लिक" शब्द है, वे निम्नलिखित हैं:
'रिपब्लिक' (The Republic) कृति प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा लगभग 380 ईसा पूर्व में लिखी गई थी। इसे राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में एक आधारभूत कार्य माना जाता है। इसे एक सुकराती संवाद (Socratic dialogue) के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो एथेंस के निकट एक बंदरगाह शहर पीरियस (Piraeus) में स्थापित है। वहाँ सुकरात और उनके मित्र एक उत्सव के लिए एकत्रित होते हैं और न्याय तथा आदर्श राज्य पर चर्चा में संलग्न होते हैं। यह संवाद दस पुस्तकों में विभाजित है, जिनमें से प्रत्येक आदर्श राज्य के विभिन्न पहलुओं, आत्मा की प्रकृति और राष्ट्र के शासकों की शिक्षा व्यवस्था को संबोधित करती है। इसका समापन दार्शनिक-राजाओं (philosopher-kings) द्वारा शासित एक न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना में होता है।
'रिपब्लिक' मात्र एक राजनीतिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि इस बात का दार्शनिक अन्वेषण है कि समाज व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से न्याय कैसे प्राप्त कर सकता है। यह सिफालस (Cephalus) द्वारा वृद्धावस्था के लाभों और न्याय पर व्यक्तिगत चिंतन के साथ प्रारंभ होता है, जो आगे चलकर न्याय की प्रकृति, राज्य की संरचना और नेतृत्व के लिए आवश्यक गुणों की व्यापक जांच की ओर ले जाता है। इस संवाद के माध्यम से प्लेटो आदर्श राज्य पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें तीन वर्ग होते हैं: दार्शनिक-राजा (शासक), सहायक (योद्धा), और उत्पादक (सामान्य लोग)। प्रत्येक वर्ग की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है, और न्याय तब प्राप्त होता है जब प्रत्येक वर्ग बिना किसी हस्तक्षेप के अपना कार्य निष्ठापूर्वक करता है।
आदर्श राज्य की अपनी दृष्टि, संतुलित सामाजिक भूमिकाओं, प्रज्ञा द्वारा निर्देशित नेताओं (दार्शनिक-राजा) के विचार और शासन के लिए शिक्षा पर विशेष बल देने के कारण 'रिपब्लिक' आज भी प्रभावशाली है। शासन के अन्य रूपों की इसकी आलोचना और विशेष रूप से प्रबोधन काल (Enlightenment) के विचारकों के माध्यम से पश्चिमी राजनीतिक विचार पर इसके प्रभाव ने इसे आदर्श संविधानों के लिए एक प्रतिमान (model) बना दिया है। यद्यपि इसके कुछ विचार, जैसे राज्य-नियंत्रित प्रजनन, पर आज भी विवाद हो सकता है।
प्लेटो की 'रिपब्लिक' और इसके पात्रों का परिचय:
1. सुकरात (Socrates): मुख्य पात्र और केंद्रीय व्यक्तित्व, एक दार्शनिक जो प्रश्न पूछने की अपनी विशिष्ट पद्धति — जिसे सुकराती पद्धति (Socratic method) कहा जाता है — के माध्यम से संवाद का नेतृत्व करते हैं। उन्हें सत्य की खोज करने और पारंपरिक विचारों को चुनौती देने वाले के रूप में चित्रित किया गया है, जो बातचीत को आदर्श राज्य और न्याय की ओर निर्देशित करते हैं।
2. ग्लाउकॉन (Glaucon): सुकरात के मित्रों में से एक और एडीमेंटस का भाई। ग्लाउकॉन चर्चा में सक्रिय रूप से भाग लेता है और अक्सर सुकरात के विचारों को चुनौती देता है, स्पष्टीकरण मांगता है और गहराई से समझने का प्रयास करता है। वह आदर्श राज्य और न्याय की प्रकृति की चर्चा में विशेष रूप से संलग्न है।
3. एडीमेंटस (Adeimantus): सुकरात का एक और मित्र और ग्लाउकॉन का भाई। एडीमेंटस भी संवाद में भाग लेता है, अक्सर ग्लाउकॉन के प्रश्नों का समर्थन करता है और अपनी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। पुस्तक 2 और 5 में उसका योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
4. सिफालस (Cephalus): एक वृद्ध सज्जन और पॉलीमार्चस के पिता। वे पुस्तक 1 में न्याय का विषय प्रस्तुत करते हैं और वृद्धावस्था के लाभों पर अपने विचार साझा करते हैं। वे न्याय को 'सच बोलने' और 'ऋण चुकाने' के रूप में परिभाषित करते हैं और फिर चर्चा को अपने पुत्र को सौंप देते हैं।
6. पॉलीमार्चस (Polemarchus): सिफालस के पुत्र। संवाद के प्रारंभिक भाग में वे न्याय की अपनी परिभाषा प्रस्तुत करते हैं — 'मित्रों का भला करना और शत्रुओं का अहित करना'। सुकरात इस परिभाषा की आलोचना करते हैं, जो चर्चा को आगे बढ़ाने का आधार बनती है।
7. थ्रेसीमाचस (Thrasymachus): एक सोफिस्ट (Sophist), जो अपने प्रभावशाली वाक-कौशल के लिए जाना जाता है। वह तर्क देता है कि 'न्याय शक्तिशाली का हित है', जो सुकरात के विचारों के विपरीत है। उसका यह निराशावादी दृष्टिकोण शेष संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करता है।
ये पात्र समाज के विभिन्न वर्गों और दार्शनिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो एथेनियन समाज की विविधता और चर्चा की गहनता को दर्शाते हैं।
'रिपब्लिक' दस पुस्तकों में विभाजित है:
दो हजार वर्ष पूर्व लिखे जाने के बावजूद 'रिपब्लिक' आधुनिक शासन प्रणालियों में अत्यधिक प्रभावशाली है क्योंकि:
1. यह एक ऐसे न्यायपूर्ण राज्य की दृष्टि प्रस्तुत करती है जहाँ सामाजिक समरसता और जनहित सर्वोपरि है।
2. यह नेतृत्व में प्रज्ञा और बौद्धिक गुणों के महत्व को रेखांकित करती है।
3. यह नेताओं के लिए कठोर शिक्षा और निरंतर सीखने की आवश्यकता पर बल देती है।
4. यह शासन के विभिन्न रूपों की कमजोरियों का विश्लेषण करती है और लोकतंत्र के निरंकुश शासन में बदलने के खतरों के प्रति सचेत करती है।
यद्यपि इसके सभी पहलू (जैसे सामूहिक जीवन) आज व्यावहारिक नहीं हैं, फिर भी यह एक पूर्णतः न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण खाका प्रदान करती है।
पुस्तक 1
पहली पुस्तक में सुकरात न्याय की परिभाषाओं को चुनौती देते हैं। सिफालस न्याय को 'सच बोलने' और 'ऋण चुकाने' तक सीमित मानते हैं, जिसे सुकरात इस तर्क से काट देते हैं कि कभी-कभी ऐसा करना हानिकारक भी हो सकता है (जैसे विक्षिप्त मित्र को उसका शस्त्र लौटाना)। पॉलीमार्चस द्वारा न्याय को 'मित्रों का भला और शत्रुओं का अहित' कहने पर सुकरात तर्क देते हैं कि न्यायपूर्ण व्यक्ति को किसी को भी हानि नहीं पहुँचानी चाहिए, क्योंकि हानि पहुँचाना किसी को और बुरा बना देता है।
थ्रेसीमाचस का यह दावा कि 'न्याय शक्तिशाली का हित है' एक निराशावादी सोच को दर्शाता है। सुकरात इसका खंडन करते हुए शासक की तुलना एक चिकित्सक से करते हैं, जिसका उद्देश्य स्वयं का लाभ नहीं बल्कि रोगी (प्रजा) का कल्याण करना होता है। पुस्तक इस निष्कर्ष के साथ समाप्त होती है कि न्याय को और गहराई से समझने के लिए पहले एक आदर्श शहर के स्तर पर इसकी जांच करनी होगी।