अध्याय 13 · यूरोपीय विचारों की आलोचना
भारतीय संविधान की अन्य अवधारणाएं
सामाजिक न्याय और कल्याण (Social Justice and Welfare)
भारतीय संविधान में 'राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत' (Directive Principles of State Policy) सम्मिलित हैं, जो यद्यपि न्यायालयों द्वारा लागू करने योग्य (enforceable) नहीं हैं, फिर भी एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना और सामाजिक व आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने के राज्य के लक्ष्यों को निर्धारित करते हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य संसाधनों का न्यायोचित वितरण और धन के संकेंद्रण को रोकना है। ये सिद्धांत आयरलैंड के संविधान से प्रेरित थे।
इनमें से धन का पुनर्वितरण समाजवादी विचारधारा से प्रेरित है, जो न केवल पूंजीवाद की वर्तमान प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध है, बल्कि उत्तराधिकार (विरासत) के सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।
शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)
फ्रांसीसी न्यायाधीश, इतिहासकार और राजनीतिक दार्शनिक मोंटेस्क्यू (1689 –1755) 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत के मुख्य स्रोत हैं, जिसे विश्व के कई संविधानों में लागू किया गया है। उनकी कृति 'द स्पिरिट ऑफ लॉ' (1748 ) ने संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के प्रारूपण को गहराई से प्रभावित किया। मोंटेस्क्यू का मानना था कि यदि ये शक्तियाँ (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाएँ, तो दमनकारी विधियाँ बन सकती हैं, अतः स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इनका पृथक्करण अनिवार्य है। भारतीय संविधान भी शासन की शक्तियों को इन तीन अंगों में विभाजित करता है ताकि शक्तियों का संकेंद्रण न हो और नियंत्रण तथा संतुलन बना रहे।
विधि का शासन (Rule of Law)
संविधान 'विधि के शासन' के सिद्धांत को प्रतिष्ठित करता है, जिसका अर्थ है कि सरकार सहित प्रत्येक व्यक्ति विधि के अधीन और उसके प्रति उत्तरदायी है। यह आधुनिक संविधानों, विशेष रूप से यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका की सामान्य विधि (common law) प्रणालियों का आधारस्तंभ है।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality)
डॉ बी आर अंबेडकर ने 'संवैधानिक नैतिकता' की आवश्यकता पर बल दिया, जिसे उन्होंने एक "पूर्ण विश्वास" के रूप में परिभाषित किया कि संविधान के रूप उनके विरोधियों की दृष्टि में भी उतने ही पवित्र होंगे जितने कि स्वयं उनकी दृष्टि में। यह विचार राजनीतिक मतभेदों के बीच भी संवैधानिक सिद्धांतों के पालन के महत्व को रेखांकित करता है।
संघीय और संसदीय प्रणाली (Federal and Parliamentary System)
भारतीय संविधान एक संघीय प्रणाली स्थापित करता है, जिसमें शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच होता है (अमेरिकी संविधान के समान)। साथ ही, यह ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाता है जहाँ प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित निचले सदन (लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
सामाजिक सुधार आंदोलन (Social Reform Movements)
संविधान भारत के सामाजिक सुधार आंदोलनों से भी प्रेरणा लेता है, जैसे कि राजा राम मोहन राय, ज्योतिराव फुले और पेरियार द्वारा चलाए गए आंदोलन, जिन्होंने जातिगत भेदभाव को चुनौती दी और लैंगिक समानता व सामाजिक न्याय की वकालत की।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
यद्यपि भारतीय संसद के पास विधि निर्माण और संविधान संशोधन की शक्ति है, तथापि 'न्यायिक समीक्षा' की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को उन विधियों और संशोधनों को निरस्त करने की अनुमति देती है जो संविधान के 'मूल ढांचे' (basic structure) का उल्लंघन करते हैं। 1973 के केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह 'मूल ढांचा' सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसमें पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र और विधि के शासन जैसे सिद्धांतों को अपरिवर्तनीय माना गया। हाल ही में 25 नवंबर 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना से 'पंथनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्दों को हटाने की याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संशोधन की शक्ति प्रस्तावना तक भी विस्तारित है।
शक्ति का क्षरण (Power Leakage)
भारतीय संविधान के अंतर्विरोध (Contradictions in the Constitution)
संविधान के कुछ प्रावधान इसके आदर्शों के साथ विरोधाभासी प्रतीत होते हैं:
संविधान सभा ने इन अंतर्विरोधों को तार्किक सिद्धांतों के बजाय विभिन्न हितों के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से स्वीकार किया है। अब समय आ गया है कि हम अपने संविधान के विदेशी दर्शन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों और पंथनिरपेक्षता जैसे विषयों पर पुनर्विचार किया जाए।
भाग तीन: प्लेटो का गणराज्य
(Plato's Republic)