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अध्याय 15 · प्लेटो का गणराज्य (Plato's Republic)

पुस्तक 2-4

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पुस्तक 2 का अवलोकन

दूसरी पुस्तक, पहली पुस्तक में थ्रेसीमाचस द्वारा दी गई उस चुनौती के आगे की चर्चा है जिसमें उसने तर्क दिया था कि 'न्याय शक्तिशाली का हित है' । सुकरात के वार्ताकार ग्लाउकॉन और एडीमेंटस इस चुनौती को और बढ़ाते हैं ताकि वे न्याय के वास्तविक और आंतरिक मूल्य का परीक्षण कर सकें । ग्लाउकॉन 'शुभ' (good) को तीन वर्गों में विभाजित करता है:

1. वे वस्तुएं जो उनके परिणामों के लिए वांछित हैं (जैसे स्वास्थ्य के लिए शारीरिक व्यायाम)।

2. वे जो अपने स्वयं के स्वरूप के लिए वांछित हैं (जैसे खुशी)।

3. उच्चतम वर्ग, जो अपने स्वरूप और परिणाम दोनों के लिए वांछित है (जैसे ज्ञान, दृष्टि और स्वास्थ्य)।

ग्लाउकॉन न्याय को प्रथम श्रेणी में रखता है और सुझाव देता है कि इसे एक 'आवश्यक बुराई' के रूप में देखा जाता है, जिसे दंड के भय या पुरस्कार की इच्छा के कारण अनिच्छा से अपनाया जाता है। यह सुकरात के लिए एक कठिन चुनौती है क्योंकि उन्हें सिद्ध करना है कि न्याय तृतीय और सर्वाधिक वांछनीय श्रेणी का हिस्सा है। एडीमेंटस इस बात पर बल देता है कि न्याय की प्रशंसा अक्सर उसके स्वरूप के बजाय उसके बाहरी लाभों, जैसे सामाजिक प्रतिष्ठा या परलोक के पुरस्कारों के लिए की जाती है।

दूसरी पुस्तक का एक महत्वपूर्ण क्षण ग्लाउकॉन द्वारा 'गाइजेस की अंगूठी' (Ring of Gyges) का उदाहरण प्रस्तुत करना है। यह एक वैचारिक प्रयोग है जिसमें एक गड़रिये को ऐसी अंगूठी मिलती है जो उसे अदृश्य कर देती है। इस शक्ति के साथ वह दंड के भय के बिना अन्याय करता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यदि परिणाम न भुगतने पड़ें, तो लोग अन्यायपूर्ण कार्य ही करेंगे । यह कहानी इस धारणा को चुनौती देती है कि न्याय स्वाभाविक रूप से शुभ है, और सुझाव देती है कि यह केवल दंड के भय से बना एक सामाजिक समझौता है।

सुकरात पहले एक शहर के स्तर पर न्याय की जांच करने का प्रस्ताव रखते हैं क्योंकि इसे बड़े स्तर पर देखना सरल है। वे एक 'स्वस्थ शहर' का निर्माण करते हैं जहाँ कुशलता के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्राकृतिक भूमिका (जैसे खेती या शिल्प) में विशेषज्ञता रखता है। जब ग्लाउकॉन इसे बहुत साधारण मानता है, तो सुकरात इसे 'विलासी शहर' के रूप में विस्तारित करते हैं, जिससे युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती है और 'रक्षकों' (guardians) की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे योद्धा जो अपनों के लिए नरम किंतु शत्रुओं के लिए उग्र होने चाहिए ।

यहाँ शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से रक्षकों के लिए, जिन्हें बचपन से संगीत, कविता और शारीरिक व्यायाम का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्लेटो का मानना है कि ईश्वर के बारे में कहानियों को नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें केवल 'पूर्णतः शुभ' के रूप में चित्रित किया जाए ।

पुस्तक 3 का अवलोकन

तीसरी पुस्तक रक्षकों की शिक्षा और प्रशिक्षण पर केंद्रित है जो राज्य के शासक और रक्षक होंगे । ये रक्षक समाज की त्रि-स्तरीय वर्ग व्यवस्था का हिस्सा हैं: उत्पादक, सहायक (रक्षक) और शासक ।

सुकरात तर्क देते हैं कि रक्षकों के चरित्र निर्माण के लिए उनके द्वारा सुनी जाने वाली कहानियों और कविताओं का चयन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए । वे होमर जैसे कवियों की उन कृतियों को प्रतिबंधित करने का सुझाव देते हैं जिनमें देवताओं को कलहपूर्ण या अन्यायपूर्ण दिखाया गया है। इसके स्थान पर कहानियों में देवताओं और नायकों को न्यायप्रिय, साहसी और सत्यवादी दिखाया जाना चाहिए । वे संगीत और साहित्य में सादगी और सामंजस्य के पक्षधर हैं, क्योंकि जटिल या अत्यधिक भावुक संगीत विकार और कमजोरी को बढ़ावा दे सकता है।

बौद्धिक और नैतिक शिक्षा के साथ-साथ, सुकरात शारीरिक फिटनेस सुनिश्चित करने के लिए व्यायाम (gymnastics) पर बल देते हैं । यह शरीर और मस्तिष्क का संतुलन शासन और रक्षा दोनों के लिए अनिवार्य है।

रक्षकों का चयन उनकी प्राकृतिक योग्यता और प्रशिक्षण में उनके प्रदर्शन के आधार पर किया जाता है। भ्रष्टाचार से बचने के लिए, रक्षकों के पास कोई निजी संपत्ति या धन नहीं होना चाहिए। उनकी आवश्यकताएं राज्य द्वारा पूरी की जाती हैं और वे व्यक्तिगत लाभ के बजाय शहर के कल्याण के लिए एक सामूहिक जीवन व्यतीत करते हैं।

पुस्तक 4 का अवलोकन

चौथी पुस्तक चार मुख्य गुणों को परिभाषित करके आदर्श शहर के निर्माण को पूर्ण करती है और उन्हें राज्य तथा व्यक्ति दोनों पर लागू करती है। सुकरात चार मुख्य सद्गुणों को गिनाते हैं: प्रज्ञा (wisdom), साहस (courage), संयम (moderation) और न्याय (justice) ।

1. प्रज्ञा: यह शासकों के ज्ञान में पाई जाती है जो शहर को सही निर्णय लेने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं ।

2. साहस: यह सहायकों (योद्धाओं) में होता है जो संकट के समय भी शहर के विश्वासों की रक्षा करते हैं ।

3. संयम: यह सभी वर्गों के बीच सामंजस्य और आत्म-अनुशासन है, जहाँ निम्न वर्ग उच्च वर्ग के शासन को स्वीकार करता है।

4. न्याय: इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि प्रत्येक वर्ग दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप किए बिना अपना निर्दिष्ट कार्य करे—शासक शासन करें, योद्धा रक्षा करें और उत्पादक कार्य करें ।

सुकरात तर्क देते हैं कि व्यक्ति की आत्मा की भी राज्य की तरह तीन परतें होती हैं: विवेक (reason), उत्साह या भावना (spirit) और क्षुधा या इच्छा (appetite) ।

सुकरात निष्कर्ष निकालते हैं कि व्यक्ति के भीतर न्याय तब प्राप्त होता है जब 'विवेक' शासन करता है, 'उत्साह' उसका समर्थन करता है और 'क्षुधा' को नियंत्रित रखा जाता है। एक न्यायपूर्ण आत्मा वह है जहाँ प्रत्येक भाग अपना कार्य निष्ठापूर्वक करता है, जिससे आंतरिक शांति और संतुलन बना रहता है। यह अध्याय इस पाठ के साथ समाप्त होता है कि न्याय केवल नियमों का समूह नहीं, बल्कि व्यवस्था और संतुलन की एक अवस्था है।