अध्याय 20 · भारत - एक नया संवैधानिक दृष्टिकोण
स्व तंत्र संविधान की प्रस्तावना
और मूलभूत सिद्धांत
अगर भारतीय दर्शन के अनुसार बना हुआ भारत का तंत्र ही सही अर्थों में स्व तंत्र कहला सकता है। अगर हम ऐसा संविधान लिखते हैं तो इसकी प्रस्तावना निम्नलिखित होगी ।
प्रस्तावना (Preamble)
हम, भारत के लोग, परमेश्वर की कृपा से, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न गणतंत्र बनाने का संकल्प लेते हैं और अपने समस्त नागरिकों को निम्नलिखित लक्ष्यों की ओर निर्देशित करने का निश्चय करते हैं:
अपने इस राष्ट्र में, आज इस ____ दिन, हम एतद्द्वारा इस संविधान का निर्माण, अधिनियमन और आत्मार्पण करते हैं।
भारत के संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांत
इस प्रस्तावित संविधान के मुख्य मार्गदर्शक सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
1. पुरुषार्थ - संस्कृत में 'पुरुष' का अर्थ चेतना और 'अर्थ' का भाव प्रयोजन है। अतः प्रत्येक मनुष्य का ध्येय अपनी चेतना का क्रमिक विकास करना है। एक राष्ट्र भी एक कृत्रिम व्यक्ति की तरह होता है और उसका विकास भी हमारी प्राथमिकता है। राष्ट्र के संदर्भ में पुरुषार्थ का अर्थ है वह मार्ग जो राष्ट्र को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने और निरंतर प्रगति की ओर ले जाए। इसे प्राप्त करने के लिए चार मुख्य उद्देश्यों का समन्वय आवश्यक है:
2. परमार्थ का संधि विच्छेद है परम अर्थ अर्थात परम सुख जो त्रिविधि दुखों के नाश से प्राप्त होता है। राष्ट्र के संदर्भ में इसका तात्पर्य है जनसाधारण के सुख की खोज। ऐसा सुख जो तीन प्रकार के कष्टों — आधिभौतिक (शारीरिक और सुरक्षा संबंधी), आध्यात्मिक (मानसिक और मनोवैज्ञानिक) और आधिदैविक (दार्शनिक और संवैधानिक) — के विनाश से प्राप्त होता है। संवैधानिक ढांचा हमारी राष्ट्रीय प्रज्ञा और दिशा का मुख्य स्रोत है।
3. पराक्रम कार्यों में प्रदर्शित शक्ति और निर्भीकता का प्रतीक है। वीरता और शौर्य एक सुदृढ़ राष्ट्र के लिए अनिवार्य हैं क्योंकि वे नागरिकों को बाधाओं को पार करने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देते हैं। राष्ट्रीय सेनाओं को सदैव शत्रुओं के विनाश हेतु तत्पर रहना चाहिए ताकि हमारे राष्ट्र की संप्रभुता बनी रहे।
4. परिश्रम का अर्थ है निष्ठापूर्ण कर्म। भारत अपने नागरिकों के लिए उनकी कर्मभूमि है। शारीरिक श्रम को प्रोत्साहन मिलना चाहिए और उसका सम्मान होना चाहिए। कठोर परिश्रम ही आर्थिक विकास और सामाजिक एकता का आधार है। "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः" — कार्यों की सिद्धि उद्यम से होती है, केवल मन की इच्छाओं से नहीं।
5. प्रेम - संपूर्ण विश्व प्रेम की शक्ति पर टिका है। सार्वजनिक अथवा समष्टि प्रेम व्यक्तिगत पक्षपात से मुक्त होकर मानवीय संवेदनाओं के साथ जुड़ने का नाम है। भारतीय परिवार प्रणाली, जो सत्य और परंपराओं पर आधारित है, विश्व में सबसे सुदृढ़ है। संविधान को व्यक्ति की तुलना में परिवार को अधिक महत्व देना चाहिए। वसुधैव कुटुंबकम सार्वभौमिक प्रेम का परिचायक है।
मूलभूत सिद्धांत (Fundamental Principles)
भारत का संविधान निम्नलिखित दस सिद्धांतों पर आधारित है।