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अध्याय 19 · भारत - एक नया संवैधानिक दृष्टिकोण

भारत - एक विचार

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भारत एक प्राचीन सभ्यता की भूमि है जिसकी सांस्कृतिक और दार्शनिक विरासत अत्यंत समृद्ध है। यह अपनी विविधता के लिए जाना जाता है, जिसमें 13 बिलियन (130 करोड़) से अधिक लोग और पंथों, भाषाओं तथा परंपराओं की एक बहुरंगी विविधता समाहित है। 1950 में अपनाए गए संविधान के अनुच्छेद 1 में इसे आधिकारिक तौर पर 'इंडिया' के साथ 'भारत' के रूप में मान्यता दी गई थी।

संस्कृत शब्द "भारत" (भ + रत) का अर्थ है वह जो ज्ञान की खोज में लीन हो। यह विचार प्रकाश और ज्ञानोदय (enlightenment) से जुड़ा है। शब्द 'भा' की व्याख्या प्रायः प्रकाश के रूप में की जाती है, जैसा कि भानु और भास्कर (सूर्य) जैसे शब्दों में देखा जाता है; तथापि, यहाँ 'भा' दृश्य प्रकाश नहीं बल्कि बोध (understanding) का अदृश्य प्रकाश है और 'रत' का अर्थ है 'निरंतर लगा हुआ' । यह अग्नि देव का भी एक विशेषण है। इस प्रकार, "भारत" प्रकाश और ज्ञान की भूमि का प्रतीक है।

भारत का दर्शन (The Philosophy of Bharat)

भारत का दर्शन वेदों, उपनिषदों और महाभारत तथा रामायण जैसे महाकाव्यों में निहित है। यह धर्म, कर्म, अर्थ और मोक्ष (मुक्ति) की खोज पर बल देता है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' जिसका अर्थ है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है, ऐसी अवधारणाएं यहाँ के प्रेम, सामंजस्य और समावेशिता के भाव को दर्शाती हैं ।

मानवता, संस्कृति और दर्शन में भारत के योगदान के लिए अनेक वैश्विक और भारतीय विभूतियों ने इसकी प्रशंसा की है:

यह भारत के वैश्विक बौद्धिक प्रभाव को रेखांकित करता है। भारतीय प्रज्ञा ने फिलासफी (ज्ञान के प्रति प्रेम) के स्तर को पार कर एक उच्च और अधिक पूर्ण रूप प्राप्त किया जिसे 'दर्शन' (दृष्टिकोण या परिप्रेक्ष्य) के रूप में जाना जाता है। एरविन श्रोडिंगर और निकोला टेस्ला जैसे कई महान वैज्ञानिक और शोपेनहावर जैसे दार्शनिक उपनिषदों से प्रभावित थे । शोपेनहावर ने जर्मन आदर्शवाद के ऊपर वेदांतिक आदर्शवाद को प्राथमिकता दी। उपनिषदों के प्रति उनके आकर्षण ने विश्व को पूर्वी मस्तिष्क के उस ज्ञानोदय से परिचित कराया जिसने पश्चिमी विचार को गहराई से प्रभावित किया ।

उनके शब्दों में, "वेदों में हमें जो प्रत्यक्ष विवरण मिलता है, वह उच्चतम मानवीय ज्ञान और प्रज्ञा का फल है, जिसका सार अंततः उपनिषदों के रूप में इस शताब्दी के महानतम उपहार के रूप में हम तक पहुँचा है"। उन्होंने कहा कि उपनिषदों का अध्ययन उनके जीवन का संतोष रहा है और उनकी मृत्यु का संतोष भी होगा ।

भारतीय दर्शनों को अक्सर दो व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: आस्तिक (अस्तित्व को मानने वाला या धर्मपरायण) और नास्तिक (आत्मा और ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वाला) ।

आस्तिक दर्शन (षड्दर्शन) में निम्नलिखित सम्मिलित हैं: I

1. सांख्य: यह सृष्टि को चेतना (पुरुष) और पदार्थ (प्रकृति) के खेल के रूप में देखता है।

2. योग: यह आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग बताता है, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि सम्मिलित हैं ।

3. न्याय: ऋषि अक्षपाद गौतम इसके संस्थापक हैं। इसका अर्थ तुलना और तर्क के माध्यम से सत्य की खोज करना है। यह मुख्य रूप से बौद्धिक, विश्लेषणात्मक और तार्किक है।

4. वैशेषिक: यह 'प्रमेय' (ज्ञान के विषय) पर केंद्रित है। कणाद इसके प्रणेता हैं। यह ब्रह्मांड की विविधता की व्याख्या करने वाला एक यथार्थवादी दर्शन है।

5. मीमांसा (पूर्व मीमांसा): ऋषि जैमिनी इसके संस्थापक थे। यह वैदिक कर्मकांडों की व्याख्या और धर्म के कर्तव्यों पर आधारित है।

6. वेदांत (उत्तर मीमांसा): यह उपनिषदों के विचारों को दर्शाता है, जो वैदिक दर्शन का शिखर हैं । यह ब्रह्म (परम सत्य), आत्मा और ब्रह्म के संबंधों की चर्चा करता है।

नास्तिक दर्शनों में चार्वाक (भौतिकवाद), बौद्ध और जैन दर्शन प्रमुख हैं।

भगवद गीता उपनिषदों के ज्ञान का सबसे संक्षिप्त सार है जो जीवन, कर्म और व्यक्ति के कर्तव्यों के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करती है। गीत की शिक्षा हमें ये बताती है कि कैसे धर्म का पालन करते हुए एक आत्मा परम आत्मा का अंश बन सकती है।