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अध्याय 12 · यूरोपीय विचारों की आलोचना

पंथ निरपेक्षता

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(Secularism)

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में "पंथनिरपेक्ष" (secular) शब्द 1976 के 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। पंथनिरपेक्षता एक राजनीतिक सिद्धांत है जो धर्म को शासन और सार्वजनिक संस्थानों से पृथक करता है, तर्क और व्यावहारिकता पर बल देता है, और राज्य के किसी पक्षपात के बिना धर्म का पालन करने या न करने की स्वच्छंदता देता है। इसका अर्थ है कि राज्य किसी विशेष धर्म को बढ़ावा नहीं देता या उसका पक्ष नहीं लेता। यह सभी नागरिकों को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वच्छंदता की गारंटी देता है।

संविधान की पंथ निरपेक्षता की आलोचना अस्पष्ट और असंगत होने के आधार पर की गई है। आलोचकों का तर्क है कि यह न केवल सांप्रदायिकता को रोकने में विफल रही है, बल्कि अक्सर बहुसंख्यक हितों की कीमत पर अल्पसंख्यक समुदायों के तुष्टीकरण के लिए उपयोग की गई है। 'सेक्युलर' शब्द, जो मूल रूप से धार्मिक संदर्भों में तटस्थ था, सार्वजनिक जीवन में धार्मिक प्रभुत्व के विरुद्ध आंदोलनों का आधार बना, जिसने शिक्षा से लेकर विधि तक सब कुछ प्रभावित किया, जो इसके प्रारंभिक "सांसारिक या व्यावहारिक" (worldly) अर्थ से बहुत परे था। यह प्रारंभिक उपयोग सांसारिक और पवित्र मामलों को अलग करने में इसकी भूमिका को रेखांकित करता है।

संवैधानिक विकास

भारत में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा एक विशिष्ट मॉडल को प्रतिबिंबित करती है जो सामाजिक कल्याण के लिए राज्य के हस्तक्षेप के साथ धार्मिक स्वच्छंदता को संतुलित करती है। यह पश्चिमी पंथनिरपेक्षता के विपरीत है, जो अक्सर राज्य और धर्म के पूर्ण पृथक्करण पर बल देती है। भारत का दृष्टिकोण "सर्व पंथ समभाव" (सभी पंथों के प्रति समान सम्मान) और "धर्म निरपेक्षता" (धर्म के प्रति राज्य की तटस्थता) के सिद्धांत पर आधारित है। धर्म जो पंथ से अलग है, अगर राष्ट्र उस धर्म से विमुख है तो वो अधर्मी बन जाता है। वहाँ भ्रष्टाचार, अन्याय, और सामाजिक विषमताऐं बढ़ जाती हैं।

संवैधानिक और विधिक ढांचा

पंथनिरपेक्षता, यद्यपि 1976 में स्पष्ट रूप से जोड़ी गई थी, भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों (भाग III - मौलिक अधिकार, भाग IV - राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत, और भाग IVA - मौलिक कर्तव्य) में पहले से ही अंतर्निहित थी ।

न्यायिक रूप से, महत्वपूर्ण मामलों ने पंथनिरपेक्षता को सुदृढ़ किया है:

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): पंथनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा घोषित किया।

बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): पुष्टि की कि पंथनिरपेक्षता में सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार सम्मिलित है।

वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (1997 ): अनुच्छेद 25 (2) के अधीन धर्मनिरपेक्ष पहलुओं (जैसे पुजारियों की नियुक्ति) के राज्य विनियमन को उचित ठहराया।

शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017): तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया, सामाजिक सुधार के लिए राज्य के हस्तक्षेप पर बल दिया।

अल्पसंख्यकों की अवधारणा

लोकतंत्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों को जनसंख्या के आकार के आधार पर निश्चित रूप से परिभाषित करना पक्षपातपूर्ण है क्योंकि यह एक स्थायी लेबल थोपता है जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की गतिशील प्रकृति को प्रतिबिंबित नहीं करता। एक वास्तविक लोकतंत्र में, "बहुसंख्यक" और "अल्पसंख्यक" की अवधारणाएं चुनावों या मतदान के परिणामों से उत्पन्न होनी चाहिए, जहाँ नागरिक विभिन्न विषयों पर अपनी प्राथमिकताएं व्यक्त करते हैं। जब इन शब्दों को मतदान से पहले ही धार्मिक पहचान से जोड़ दिया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक निर्णय लेने के सार को कमजोर करता है और राजनीतिक प्रणाली में पूर्वाग्रह उत्पन्न करता है।

जब एक धार्मिक समूह को केवल उसकी जनसांख्यिकीय संख्या के आधार पर स्थायी रूप से "अल्पसंख्यक" का लेबल दे दिया जाता है, तो मतदान की गतिशीलता खो जाती है। उदाहरण के लिए, एक धार्मिक समूह आर्थिक या शासन के विषयों पर बहुसंख्यकों के साथ संरेखित हो सकता है, फिर भी अपने विश्वास के कारण उसे अल्पसंख्यक माना जाता है। धार्मिक पहचान को स्थायी रूप से परिभाषित करने के लिए उपयोग करना इस वास्तविकता की उपेक्षा करता है और यह मान लेता है कि धर्म ही वह प्राथमिक चश्मा है जिसके माध्यम से राजनीतिक भागीदारी होती है।

अल्पसंख्यक को मतदान के परिणामों के संदर्भ के बिना "अल्पसंख्यक" कहना लोकतंत्र में असंवैधानिक माना जा सकता है क्योंकि यह उस चुनावी प्रक्रिया की उपेक्षा करता है जो प्रतिनिधित्व और शक्ति का निर्धारण करती है। यह एक समूह को स्थायी रूप से अधीनस्थ राजनीतिक स्थिति में बंद कर देता है। इसे संबोधित करने के लिए, "बहुसंख्यक" और "अल्पसंख्यक" शब्दों को चुनावी परिणामों से उभरने वाली गतिशील अवधारणाओं के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए, न कि स्थिर धार्मिक जनसांख्यिकी के रूप में।

धर्म परिवर्तन

भारत में धर्म परिवर्तन एक तरह का 'असममित युद्ध' (asymmetric warfare) है। यह विदेश से पैसे लेकर, सोची-समझी रणनीति के तहत चलाया जाने वाला एक अभियान है। इसका मकसद लोगों की सोच में दरार डालना, हमारी सभ्यता की यादों को मिटाना, और भारत देश की संप्रभुता को कमज़ोर करना है। यह एक ऐसा "धार्मिक ट्रोजन हॉर्स" है जो मानवाधिकारों की आड़ में घुसता है, लेकिन अपने साथ देश को तोड़ने वाले (बाल्कनाइज़ेशन वाले) सैनिक लाता है।

भारत की अखंडता को बचाने और विदेशी पंथों की रणनीति का मुकाबला करने के लिए, नीचे दिए गए उपायों को अपनाने की आवश्यकता है:

संविधान के 'अल्पसंख्यक' संबंधी अनुच्छेदों में बदलाव: भारतीय संविधान में "अल्पसंख्यक" शब्द की कोई औपचारिक परिभाषा नहीं दी गई है। समानता पर आधारित लोकतंत्र में, अल्पसंख्यक का दर्जा तभी मिलता है जब लोकतांत्रिक वोटिंग के बाद कोई बहुमत वाला समूह सत्ता में आता है। फिर भी, संविधान धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को मान्यता देता है, और उन्हें अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अपनी संस्कृति को बचाने और अपने शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 29 में "नागरिकों के किसी भी वर्ग" का ज़िक्र है जिनकी अपनी अलग भाषा, लिपि या संस्कृति हो; इसे केवल भारत की मूल (जातीय) संस्कृतियों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 30 विशेष रूप से अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है। ईसाई धर्म और इस्लाम दुनिया के बड़े धर्म हैं, इसलिए उन्हें 'अल्पसंख्यक सांस्कृतिक समूह' नहीं माना जा सकता। अनुच्छेद 30 विशेष रूप से अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है, और वैश्विक धर्मों को इसका हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

धर्म परिवर्तन पर पूरी तरह रोक: तर्क: चूंकि धर्म परिवर्तन "राष्ट्र-विमुखता" (denationalisation) और "आध्यात्मिक हिंसा" का एक हथियार है, जो सामाजिक एकता को तोड़ता है और विदेशी नीतियों के लक्ष्यों को पूरा करता है। इसलिए इसे कानूनी तौर पर प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। यह किसी की आस्था पर रोक नहीं है, बल्कि यह अपनी निष्ठा को अपनी सभ्यता से हटाकर किसी विदेशी या अंतर्राष्ट्रीय संस्था के प्रति समर्पित करने के राजनीतिक कृत्य पर लगाई गई रोक है।

कार्यप्रणाली: एक केंद्रीय 'धर्म परिवर्तन-विरोधी कानून' बनाया जाए, जो न केवल "ज़बरदस्ती" किए गए धर्म परिवर्तन को अपराध माने, बल्कि संगठित और प्रलोभन देकर किए जाने वाले धर्म प्रचार (proselytization) को भी अपराध घोषित करे।

धार्मिक/सामाजिक NGOs के लिए विदेशी फंडिंग (FCRA) पर पूरी तरह रोक: पैसा ही इस 'असममित युद्ध' का गोला-बारूद है। पश्चिमी पूंजी और चर्च के बीच जो "आपसी निर्भरता वाला रिश्ता" (symbiotic relationship) है, उसे खत्म किया जाना चाहिए। "मानवाधिकार" और "विकास" जैसे मुद्दे, ईसाई धर्म प्रचारकों और अलगाववादी ताकतों के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले 'ट्रोजन हॉर्स' साबित हुए हैं। FCRA कानून में संशोधन करके, किसी भी ऐसे संगठन के लिए विदेशी फंडिंग पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए जिसका कोई धार्मिक जुड़ाव हो, या जो संवेदनशील आदिवासी/सीमावर्ती इलाकों में काम करता हो। देश के प्रति निष्ठा सुनिश्चित करने के लिए, घरेलू NGOs को केवल देश के भीतर से ही आर्थिक मदद मिलनी चाहिए।

बौद्धिक सुरक्षा कवच: "आत्मसातीकरण" और "बौद्धिक दरारों" का मुकाबला करने के लिए, भारत को अपनी शिक्षा प्रणाली का वि-औपनिवेशीकरण करना चाहिए। स्वदेशी आस्थाओं को आक्रामक अतिक्रमण से बचाने और हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए "स्वदेशी परंपरा स्वतंत्रता अधिनियम" पारित किया जाना चाहिए, ताकि उनके संसाधनों का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए किया जा सके।

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)

धर्म से सीखे बिना पंथनिरपेक्षता के विचार को अपनाना वैसा ही है जैसे "बच्चे को नहाने के पानी के साथ बाहर फेंक देना" । यहाँ "नहाने का पानी" पादरियों या पुरोहित वर्ग का राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रभाव है। यदि शासन पूरी तरह से धर्म से दूर रहने का विकल्प चुनता है, तो उसे इसे निरंतरता के साथ करना चाहिए। वर्तमान में, भारत की विधिक प्रणाली में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार का संचालन करने वाले धर्म-विशिष्ट व्यक्तिगत कानून सम्मिलित हैं, जो विश्वास के आधार पर नागरिकों के बीच असमानताएं उत्पन्न करते हैं।

पूरी तरह से पृथक रहने के लिए ऐसी भिन्नताओं को समाप्त करना आवश्यक है, और उनके स्थान पर एक पंथनिरपेक्ष, समान विधिक मानक लागू करना चाहिए जो सभी पर लागू हो। एक समान नागरिक संहिता, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 44 में परिकल्पित है, धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के लिए कानूनों का एक एकल समूह स्थापित करेगी।

भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) के संबंध में कुछ मुसलमानों के बीच आशंका अक्सर बहुविवाह (polygamy) के संभावित उन्मूलन पर केंद्रित होती है। तथापि, भारतीय समाज में बहुविवाह और बहुपतित्व (polyandry) दोनों के ऐतिहासिक उदाहरण रहे हैं। हिमालयी क्षेत्रों (जैसे जौनसारी जनजाति) में बहुपतित्व और कुछ जनजातीय समुदायों में बहुविवाह को परंपरा और निष्पक्षता को संतुलित करने के लिए विनियमित शर्तों के साथ UCC में एकीकृत किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, उत्तरवर्ती विवाहों के लिए शासन की स्वीकृति और वर्तमान पति/पत्नी से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC) की आवश्यकता पारदर्शिता और अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, जिससे सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए संभावित शोषण को कम किया जा सके।

एक एकीकृत नागरिक संहिता धार्मिक विभाजनों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ कर सकती है। यह संकेत देगा कि राज्य धार्मिक पहचान के ऊपर नागरिकता को प्राथमिकता देता है, जिससे साझा अपनेपन और भाईचारे की भावना विकसित होगी।