अध्याय 22 · भारत - एक नया संवैधानिक दृष्टिकोण
अस्तित्व का सिद्धांत
मानवता अपने पूर्वजों से एक अत्यंत गहन विरासत प्राप्त करती है। इस विरासत में भूमि और संसाधन, संस्कृति, इतिहास और यहाँ तक कि वह डीएनए (DNA) भी सम्मिलित है जो हमारे अस्तित्व को आकार देता है। यह उत्तराधिकार केवल दोहन की जाने वाली कोई वस्तु नहीं है, बल्कि एक पवित्र धरोहर (sacred trust) है; यह वह आधार है जिस पर हम अपने जीवन और समाजों का निर्माण करते हैं और इसे अगली पीढ़ियों को सौंपते हैं ।
सूक्ष्मतम जीव से लेकर अत्यंत जटिल तक, पृथ्वी पर प्रत्येक जीवित प्राणी, किसी एक अस्तित्व में अंतर्निहित भूमिका धारण करता है। हरेक अस्तित्व का एक उद्देश्य है। यह उद्देश्य प्रत्येक इकाई को अस्तित्व का एक स्वाभाविक अधिकार प्रदान करता है, और यह अधिकार तब तक अनुल्लंघनीय रहता है जब तक कि कोई दूसरों के अस्तित्व के लिए खतरा बनकर इसे खो न दे । इस ग्रह पर हमारे सह-निवासियों के रूप में पशु भी दया और सम्मान के पात्र हैं, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति के सूक्ष्म संतुलन में हमारे साथ जुड़ा हुआ है। हमें वनस्पतियों और जीवों की आनुवंशिकी (genetics) में हस्तक्षेप करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसे कार्यों के प्राकृतिक व्यवस्था के लिए दूरगामी परिणाम हो सकते हैं ।
"शांतिपूर्ण अस्तित्व का अधिकार" एक मूलभूत अधिकार है। यह जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर के "जियो और जीने दो" के सिद्धांत में भी प्रतिबिंबित होता है। यह जैन दर्शन का एक मूल सिद्धांत है, जो अहिंसा और सभी जीवित प्राणियों के अस्तित्व के अधिकार के सम्मान पर बल देता है। इस सिद्धांत का पालन तब तक किया जाना चाहिए जब तक कि राष्ट्र, धर्म या स्वयं (आत्म-रक्षा और परिवार की सुरक्षा) के अस्तित्व को कोई खतरा न हो ।
आत्म-संयमित व्यवहार बनाम पूर्ण स्वच्छंदता (Self-Limiting Behaviour versus Complete Liberty)
पूर्ण स्वच्छंदता की अवधारणा, यद्यपि आकर्षक प्रतीत होती है, परंतु उत्तरदायित्व से अलग होने पर विनाशकारी सिद्ध होती है। इतिहास और प्रयोग दोनों ही अनियंत्रित स्वच्छंदता के खतरों को प्रकट करते हैं। कला-साधक मरीना अब्रामोविच द्वारा किया गया 'रिदम 0' (Rhythm 0) प्रयोग इस सत्य का एक भयावह प्रमाण है। इस प्रयोग में, अब्रामोविच ने स्वयं को दर्शकों की इच्छा के अधीन कर दिया और उनके उपयोग के लिए 72 वस्तुएं—जिनमें एक पंख, एक गुलाब और एक भरी हुई बंदूक भी सम्मिलित थी—रख दीं, साथ ही दर्शकों के कार्यों को परिणामों की बाध्यता नहीं थी । जो कार्य प्रारंभ में केवल एक जिज्ञासा से शुरू हुए, वह शीघ्र ही हिंसा में बदल गए। प्रतिभागियों ने उनका अमानवीयकरण कर दिया, उनकी त्वचा को काटा और यहाँ तक कि उनके सिर पर बंदूक भी लगा दी । यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाता है: उत्तरदायित्व के बिना पूर्ण स्वच्छंदता मानवीय स्वभाव के गहनतम अंधकारमय आवेगों को मुक्त करती है, जिससे सामंजस्य और समरसता के स्थान पर केवल अराजकता उत्पन्न होती है।
इसके विपरीत, 'शिष्ट' अर्थात आत्म-संयमित व्यवहार की अवधारणा एक अधिक विवेकपूर्ण मार्ग प्रदान करती है। संयम और कर्तव्य में निहित, 'शिष्ट' व्यक्तियों को दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना के साथ अपनी स्वच्छंदता को संतुलित करने का आह्वान करता है, जिससे एक ऐसे समाज का निर्माण होता है जहाँ सम्मान और व्यवस्था बनी रहती है। एक शांतिपूर्ण समाज आक्रामकता और प्रभुत्व के स्तंभों पर खड़ा नहीं हो सकता; इसके लिए सामंजस्य की आवश्यकता होती है, जो अहिंसा और अधिपत्यहीनता (non-dominance) के दोहरे सिद्धांतों पर आधारित हो ।
ये आदर्श उन 'शिष्टों' के आचरण में अभिव्यक्त होते हैं, जिनका हृदय व्यक्तिगत स्वार्थ की इच्छाओं से मुक्त है और जो दूसरों का भला करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । ऐसा व्यक्ति, जिसे 'शिष्ट' कहा जाता है, आचरण के एक उच्च स्तर का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो सामूहिक कल्याण के लिए व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठता है। 'शिष्ट' शब्द और इसका अर्थ ब्रह्मर्षि और सप्तर्षि वशिष्ठ के धर्म सूत्र में समझाया गया है। इस सद्गुण का अभ्यास 'शिष्टाचार' (Śiṣṭācāra) के रूप में किया जाता है, जो समाज की उन परंपराओं पर बल देता है जिनमें शिष्टता, सौजन्य और शालीनता समाहित है। यह व्यवहार केवल औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि सभ्य व्यक्तियों का यह आचरण पारस्परिक सम्मान और नागरिकता का वातावरण निर्मित करता है। शिष्टाचार का पालन करने से संघर्ष बल के बजाय समझ के माध्यम से सुलझाए जाते हैं, जो एक ऐसे सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की आधारशिला रखता है जहाँ शक्ति का प्रयोग दमन के लिए नहीं बल्कि उत्थान के लिए किया जाता है।
नागरिकों के अस्तित्व की रक्षा में सरकार की भूमिका
अस्तित्व के सिद्धांत को बनाए रखने में व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सरकार समाज के संरक्षक और एक कुलपति (patriarch) के रूप में एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व वहन करती है। नागरिकों के मूल अधिकारों, जैसे कि सम्यक प्रक्रिया (due process) का सम्मान और संरक्षण करना अनिवार्य है। ये संरक्षण व्यक्तिगत गरिमा को बनाए रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ निष्पक्षता और न्याय का व्यवहार हो । गरिमा की रक्षा के अतिरिक्त, ये नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास को बढ़ावा देकर सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करते हैं । इसके अतिरिक्त, ऐसे सुरक्षात्मक उपाय नवाचार और प्रगति के अनुकूल वातावरण निर्मित करते हैं, जिससे व्यक्तियों को राष्ट्र के विकास में सार्थक योगदान देने हेतु सशक्त बनाया जा सके ।
शिक्षा भी सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। यह राज्य का कर्तव्य है कि वह सही और प्रासंगिक शिक्षा को बढ़ावा दे, जिससे नागरिकों को एक जटिल विश्व में उन्नति करने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल से सुसज्जित किया जा सके । तथापि, उत्तरदायित्व साझा होते हैं: जबकि सरकार शिक्षा का ढांचा प्रदान करती है और सुरक्षा सुनिश्चित करती है, व्यक्तियों और स्थानीय समुदायों को रोजगार खोजने और अपनी जीविका सुरक्षित करने का उत्तरदायित्व उठाना चाहिए । इसी प्रकार, व्यक्तिगत सुरक्षा प्रत्येक व्यक्ति की सतर्कता और आत्म-देखभाल पर निर्भर करती है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा और समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का व्यापक कार्य प्रशासन का है।
आर्थिक समृद्धि: एक सार्थक अस्तित्व का आधार
आज के विश्व में एक सम्मानजनक और सार्थक अस्तित्व एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है। आर्थिक समृद्धि शून्य में उत्पन्न नहीं होती; इसके लिए निरंतर प्रयास और एक सुदृढ़ विधिक ढांचे की आवश्यकता होती है। संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करके, निष्पक्ष अनुबंधों को लागू करके और एक स्थिर विधिक वातावरण बनाकर, संविधान विकास की आधारशिला रखता है। ये तत्व निवेश और उद्यमिता को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे व्यक्तियों और व्यवसायों को फलने-फूलने का अवसर मिलता है। एक समृद्ध अर्थव्यवस्था, बदले में, राष्ट्र को सुदृढ़ करती है और उसे वैश्विक मंच पर एक गतिशील और प्रतिस्पर्धी राष्ट्र के रूप में स्थापित करती। तथापि, यह समृद्धि 'परम कल्याण' (Summum Bonum) के सिद्धांतों पर होनी चाहिए, ताकि धन अधिपत्य का साधन न बन साझा प्रगति का माध्यम बने ।
एक सामंजस्यपूर्ण और समृद्ध समाज की ओर यात्रा अधिकारों और उत्तरदायित्वों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन पर टिकी है। जब भी कोई संदेह हो, हमें प्रकृति के साथ आलंबित होना चाहिए ।
वास्तविकता के साथ संरेखण का सिद्धांत (The Principle of Alignment with Reality)
मानवता का अस्तित्व, विकास और उन्नति वास्तविकता के साथ संरेखण पर निर्भर है, चाहे वह बाहरी वातावरण हो या हमारा आंतरिक जैविक ढांचा। प्रकृति मानवता की उत्तरजीविता के लिए मार्गदर्शक रही है, जिसने हमारे विकास को आकार देने वाले समाधान प्रदान किए हैं । प्रकृति के साथ संरेखित होने का अर्थ है पर्यावरण और अपनी जैविक संरचना के साथ सामंजस्य में रहना। यह दृष्टिकोण जीवनशैली के चुनावों, चिकित्सा और आनुवंशिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ प्राकृतिक प्रक्रियाओं के निकट रहने से अक्सर सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं ।
यद्यपि जीन संपादन (gene editing) में संभावनाएं हैं, परंतु पारिस्थितिकी तंत्र या मानवीय डीएनए के साथ छेड़छाड़ अनपेक्षित परिणामों का जोखिम उत्पन्न करती है: जैसे जीन-ड्राइव खाद्य श्रृंखलाओं को अस्थिर कर सकते हैं और 'डिज़ाइनर बेबी' (designer babies) सामाजिक असमानताओं को बढ़ा सकते हैं । जैसा कि अल्बर्ट आइंस्टीन ने चेतावनी दी थी, हमें अपनी तकनीक को अपनी मानवता से आगे नहीं निकलने देना चाहिए। पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण मानवीय उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य है।
ब्लू ज़ोन (Blue Zones) में रहने वाले लोगों से हमें यह सीख मिलती है कि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे ओकिनावा, सार्डिनिया आदि) की जनसंख्या प्राकृतिक संरेखण के माध्यम से दीर्घायु प्राप्त कर रही है। यह संरेखण पादप-आधारित आहार (legumes, greens, whole grains), सामुदायिक एकजुटता और शारीरिक गतिविधि के माध्यम से प्राप्त होता है। बाहरी और मानवीय प्रकृति के साथ यह संरेखण एक संतुलित और उदार समाज का समर्थन करता है।
मानवता का भविष्य प्रकृति के नियमों के साथ पुनः संरेखित होने पर टिका है। जैसा कि रेचल कार्सन ने सचेत किया था, "मनुष्य प्रकृति का एक अंग है, और प्रकृति के विरुद्ध उसका युद्ध अनिवार्य रूप से स्वयं के विरुद्ध युद्ध है"। प्रकृति के साथ संरेखण केवल एक कल्पनात्मक आदर्श नहीं है, बल्कि उत्तरजीविता और विकास के लिए एक व्यावहारिक अनिवार्यता है। हमारे अपने चारों ओर और अपने भीतर की प्रकृति को समझकर ही हम भावी पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं ।
भाग पाँच: शासन की संरचना और प्रणालियाँ