अध्याय 27 · शासन की संरचना और प्रणालियाँ
एक न्यायपूर्ण समाज
आधुनिक युग में एक न्यायपूर्ण समाज प्रत्येक व्यक्ति की अंतर्निहित गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और मूल्य की पुष्टि करता है, चाहे उसकी पहचान, वर्ग या परिस्थितियाँ कुछ भी हों। यह समाज गुण (सद्गुण), कर्म और समता (Equity) पर आधारित होता है। यह अधिकार (entitlement) के बजाय सशक्तिकरण के माध्यम से सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास करता है, जिससे विकास, सामंजस्य और स्थिरता को बढ़ावा देने वाला सही वातावरण का निर्माण हो सके।
एक सही वातावरण ही एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करता है। चुनौतियाँ और पुरस्कार सभी के लिए समान होने चाहिए। विधि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो निर्बलों को सशक्त बनाए और शक्तिशाली पर नियंत्रण रखे । प्रत्येक व्यक्ति को संवैधानिक उपचारों का अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए। ऐसा समाज व्यक्तिगत अधिकारों और सामूहिक आवश्यकताओं के बीच तालमेल बिठाता है और कानूनी, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संस्थानों में प्रणालीगत निष्पक्षता स्थापित करता है।
ऐसे समाज के केंद्र में एक निष्पक्ष और प्रभावी न्यायपालिका होती है, जो न केवल विधियों (laws) की निष्पादक है बल्कि न्याय की प्राथमिक संरक्षक भी है। संविधान को मानवीय स्वभाव की इस वास्तविकता के साथ संरेखित होना चाहिए कि मनुष्य दोषपूर्ण (fallible) होते हैं और सत्ता का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति रखते हैं, साथ ही यह धर्म को भी स्वीकार करता है जो अस्तित्व को उद्देश्य प्रदान करता है। इसमें सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियंत्रण और संतुलन (checks and balances), एक सुव्यवस्थित न्यायपालिका और एक उत्तरदायी तथा स्वतंत्र प्रेस जैसे तंत्र सम्मिलित होने चाहिए। इसके अतिरिक्त, नागरिक चार्टर की रक्षा करके, वंचितों का समर्थन करके, अनुचित हस्तक्षेप को सीमित करके और अपराध का दमन करके, यह करुणा के साथ शक्ति का संतुलन बनाकर समस्त जीवन का पोषण कर सकता है।
व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भ्रष्टाचार मुक्त सामाजिक और राजनीतिक वातावरण अनिवार्य है। संविधान को सद्गुणों और प्रतिभा को पुरस्कृत करना चाहिए, असामाजिक और अशिष्ट व्यवहार को सीमित करना चाहिए और नवाचार, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व तथा आर्थिक गतिशीलता को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे उत्कृष्टता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सके। इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए विधि के शासन, समता, जनतांत्रिक भागीदारी और मानवाधिकारों के सिद्धांतों पर आधारित व्यापक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।
एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना और उसे बनाए रखने के लिए मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
1. विधि का शासन और न्यायिक शुचिता (Rule of Law and Judicial Integrity): न्याय के लिए एक वैध और न्यायसंगत कानूनी ढांचा आधारभूत है। एक स्वतंत्र और जवाबदेह न्यायपालिका, न्याय तक सबकी पहुँच और संस्थागत उत्तरदायित्व ही विधि के शासन और न्यायिक शुचिता सुनिश्चित कर सकते हैं।
2. सामाजिक समता और मानवाधिकार (Social Equity and Human Rights): न्याय सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन की मांग करता है।
भेदभाव विरोधी विधान: जाति, लिंग, धर्म या वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव को दंडित करने वाले कानूनों का प्रवर्तन सामाजिक एकता के लिए महत्वपूर्ण है।
सकारात्मक कार्यवाही (Affirmative Action): आर्थिक रूप से निर्बल, दिव्यांगों और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के उत्थान के लिए सक्रिय उपाय किए जाने चाहिए।
3. आर्थिक निष्पक्षता (Economic Fairness): समता कानूनी अधिकारों से परे भौतिक और आर्थिक न्याय तक विस्तारित होनी चाहिए।
जीवन निर्वाह मजदूरी: न्यूनतम मजदूरी कानूनों को बुनियादी जीवन लागत के अनुसार समायोजित किया जाना चाहिए, जिससे सभी श्रमिकों के लिए गरिमापूर्ण जीवन स्तर सुनिश्चित हो सके।
प्रगतिशील कराधान और धन का पुनर्वितरण: न्यायसंगत कर संरचना और आवश्यक सेवाओं के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण असमानता को कम कर सकता है।
सार्वभौमिक बुनियादी सेवाएँ: सरकारों को स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कानूनी सहायता और स्वच्छ जल तक सार्वभौमिक पहुँच को मौलिक अधिकारों के रूप में सुनिश्चित करना चाहिए।
4. जनतांत्रिक भागीदारी: एक समावेशी लोकतंत्र यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक की सार्वजनिक जीवन को आकार देने में भूमिका हो।
5. सुधारात्मक न्याय (Restorative Justice): न्याय प्रणालियों को केवल दंडात्मक उपायों के बजाय पुनर्वास और सुलह पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
6. पर्यावरणीय न्याय (Environmental Justice): एक न्यायपूर्ण समाज को पर्यावरण और पारिस्थितिक समता को भी संबोधित करना चाहिए। प्रदूषण के लिए उत्तरदायी संस्थाओं और राष्ट्रों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। स्थानीय समुदायों और स्वदेशी लोगों को उनकी भूमि का विधिक अधिकार मिलना चाहिए और उन्हें नीति-निर्माण में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
7. शिक्षा और सहानुभूति (Education and Empathy): न्याय की संस्कृति विकसित करने के लिए नागरिक चेतना और पारस्परिक सम्मान का विकास आवश्यक है। विद्यालयों को कम आयु से ही विवेचनात्मक सोच, नैतिक तर्क और संवैधानिक समझ सिखानी चाहिए। सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच समझ बढ़ानी चाहिए ताकि साझा अनुभवों से पूर्वाग्रहों को दूर किया जा सके।
डॉ मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था, "नैतिक ब्रह्मांड का चाप लंबा है, परंतु यह न्याय की ओर झुकता है।" तथापि, यह चाप स्वयं नहीं झुकता; इसे समता और गरिमा के प्रति समर्पित व्यक्तियों और संस्थानों के सामूहिक कार्यों द्वारा झुकाया जाता है।
सही मंतव्य का सिद्धांत
सही मंतव्य (अभिप्राय, प्रयोजन, आशय, इरादा) का सिद्धांत नैतिक व्यवहार के लिए एक मार्गदर्शक ढांचा है। यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक, राजनेता, नौकरशाह और व्यवसायी उत्तरदायित्व और नैतिकता के साथ कार्य करे, और उन 'अनुचित मार्गों' (shortcuts) से बचे जो सामान्य कल्याण के ऊपर व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को 'शुभ संकल्प' (good faith) और शुचिता के साथ कार्य करना चाहिए।
इसका अर्थ है:
कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी नैतिक शासन पर बल देता है। उन्होंने शासकों और अधिकारियों को शुचिता के साथ कार्य करने का परामर्श दिया था, जिसमें भ्रष्टाचार को दंडित करना और राज्य को सुदृढ़ रखना सम्मिलित था। शुभ संकल्प और शुचिता को प्राथमिकता देना एक कार्यशील समाज के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
नागरिक घोषणापत्र (Citizen’s Charter)
आज के तीव्र तकनीकी प्रगति और वैश्विक परस्पर जुड़ाव वाले विश्व में, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को आधुनिक समाज की आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए विकसित होना चाहिए। नागरिकों के मौलिक अधिकार निम्नलिखित होने चाहिए:
1. शांतिपूर्ण अस्तित्व का अधिकार: प्रत्येक नागरिक को हिंसा, संघर्ष और प्रणालीगत उत्पीड़न से मुक्त समाज में रहने का अधिकार है। इसमें व्यक्तिगत सुरक्षा और शांति को बढ़ावा देना सम्मिलित है। राज्य की जिम्मेदारी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा बनाए रखने और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संस्कृति विकसित करने की होगी।
2. अभिव्यक्ति और संघ बनाने की स्वतंत्रता: नागरिक अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं (जो 'शिष्ट' द्वारा आत्म-नियंत्रित हो), जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित हो सकते हैं।
3. निजता का अधिकार (Right to Privacy): प्रत्येक नागरिक को अपने व्यक्तिगत जीवन, संचार और विवरण की निजता का अधिकार है।
4. सूचना और शिक्षा तक पहुँच का अधिकार: नागरिक सार्वजनिक संस्थानों से पारदर्शी जानकारी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के हकदार हैं।
5. समता और भेदभाव-रहित व्यवहार का अधिकार: प्रत्येक नागरिक विधि के समक्ष समान है और सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित होने चाहिए।
6. पर्यावरण और स्थिरता का अधिकार: प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ हवा, पानी और प्राकृतिक संसाधनों सहित एक स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार है। राज्य को भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्थिरता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
7. न्याय और विधि के शासन का अधिकार: प्रत्येक नागरिक को एक निष्पक्ष और स्वतंत्र कानूनी प्रणाली तक पहुँच प्राप्त हो ।
सद्गुण, प्रतिभा और उत्कृष्टता का प्रसार
एक गतिशील और नैतिक समाज के निर्माण के लिए नागरिकों की नैतिक अखंडता, विविध क्षमताओं और असाधारण उपलब्धियों को पोषित करना अनिवार्य है। समाज को नैतिक और चारित्रिक विकास को व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन की आधारशिला के रूप में प्राथमिकता देनी चाहिए। शिक्षा प्रणालियों और सामुदायिक पहलों में सत्यनिष्ठा, सहानुभूति और नागरिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को सम्मिलित करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी विशिष्ट प्रतिभाओं को पहचानने और निखारने के समान अवसर मिलने चाहिए। उत्कृष्टता को एक सांस्कृतिक मानदंड बनना चाहिए, जो समाज को नई ऊंचाइयों पर ले जाए।
अंततः, प्रत्येक नागरिक को अपने संविधान और शासन प्रणालियों के विकास में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि बदलती परिस्थितियों और तकनीकी प्रगति के साथ शासन व्यवस्था भी अनुकूल और प्रभावी बनी रहे।