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अध्याय 3 · वर्तमान संविधान और दार्शनिक आधार

संविधान

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संविधान वह आधारभूत विधिक प्रलेख (legal document) है जो किसी राष्ट्र की संरचना, सिद्धांतों और शासन व्यवस्था को परिभाषित करता है। यह वो सर्वोच्च विधि है, जो देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे को आकार देती है। संविधान एक राष्ट्र की आत्मा है , यह वह संहिता, दर्शन और प्रज्ञा है जिसके द्वारा कोई राष्ट्र जीवित रहता है, संघर्ष करता है, और फलता-फूलता है। यह स्वयं को शासित करने वाला एक राष्ट्रीय प्रलेख है; यह संदर्भ का वह दस्तावेज है जिसके द्वारा लोग मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं, शंकाओं और अंतर्विरोधों का स्पष्टीकरण पा सकते हैं और निवारण कर सकते हैं, और यह वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों को निरंतर विकास की ओर प्रेरित करता है।

'कॉन्स्टिट्यूशन' (Constitution) शब्द की व्याख्या संज्ञा और क्रिया दोनों रूपों में की जा सकती है। संज्ञा के रूप में, 14 वीं शताब्दी के मध्य में इसका अर्थ 'विधि, नियम, आदेश; नियमों, रीति-रिवाजों या विधियों का समूह' था। यह शब्द पुरानी फ्रांसीसी के 'कॉन्स्टिट्यूशन' (12 वीं शताब्दी) से आया है, जिसका अर्थ 'संविधान, स्थापना' है, और प्रत्यक्ष रूप से लैटिन के 'कॉन्स्टिट्यूशनम' (constitutionem) से लिया गया है, जिसका अर्थ 'निश्चित करने का कार्य, व्यवस्थित की गई कोई वस्तु, विनियमन, व्यवस्था, अध्यादेश' है। 'स्थापित करने की क्रिया, निर्माण' का अर्थ लगभग 1400 ईस्वी से प्रचलित है। 'राज्य के संगठन की पद्धति' का भाव 1600 ईस्वी के आसपास से आया और 'मौलिक सिद्धांतों की वह प्रणाली जिसके द्वारा एक समुदाय शासित होता है' का अर्थ 1730 के दशक का है।

एक संविधान नियमों के समूह से कहीं अधिक है, यह वह आधार है जो राष्ट्र के पथ को निर्धारित करता है। एक सुदृढ़ संविधान का निर्माण और रखरखाव किसी राष्ट्र की सफलता या विफलता के लिए महत्वपूर्ण है। एक त्रुटिपूर्ण ढंग से तैयार किया गया संविधान किसी राष्ट्र को उसके विनाश की ओर ले जा सकता है। हमारा व्यक्तिगत (कान्स्टिटूशन) संविधान वह है जिससे हम बने हैं, हम कैसे जीवित रहते हैं, स्वयं को बनाए रखते हैं, विकसित होते हैं और उत्सव मनाते हैं। यह वह तत्व है जो हमें 'गठित' (constitutes) करता है और यही हमारा वास्तविक संविधान है। एक व्यक्ति का संविधान उसके शारीरिक, भावनात्मक और बौद्धिक ढांचे के बारे में होता है। राष्ट्र के संदर्भ में, इसका अर्थ है कि एक राष्ट्र क्या जानता है या किस ज्ञान पर विश्वास करता है और इस ज्ञान का उपयोग कल्याण (स्वयं के कल्याण के साथ-साथ दूसरों के लिए एक अच्छे प्रभाव) के लिए कैसे किया जाएगा। राष्ट्र का संविधान केवल उसके लोगों, भूमि, वनस्पति, जीव-जंतुओं, उसके धन और संसाधनों से ही नहीं, बल्कि उसके इतिहास, कला, संस्कृति, परंपराओं, ज्ञान और प्रज्ञा से भी बनता है।

एक संविधान राष्ट्र के शासन की आधारशिला के रूप में कार्य करता है, जो शासन शक्ति की संरचना और सीमाओं को स्थापित करते हुए अपने नागरिकों के अधिकारों और उत्तरदायित्वों को परिभाषित करता है। पश्चिमी देशों के संविधान को दो भागों में विभाजित माना जा सकता है: एक व्यावहारिक (secular) अग्रभाग और एक पृष्ठभूमि। पृष्ठभूमि का संविधान 'बाइबल' से उत्पन्न होता है, जो सदैव एक पृष्ठभूमि दर्शन प्रदान करता है। न्यायालय में बाइबल पर हाथ रखकर शपथ ली जाती है। इसका अर्थ है कि यह वह दस्तावेज है जिससे लोगों को सत्य से जुड़ने की अपेक्षा की जाती है। अग्रभाग एक धर्मनिरपेक्ष (व्यावहारिक) संविधान है जो उन्हें धार्मिक संगठनों के हस्तक्षेप के बिना राज्य के कार्यों के संचालन की अनुमति देता है। एक व्यावहारिक या पंथ निरपेक्ष संविधान उन विचारों की भी अनुमति दे सकता है जो ईसाई धर्म के अनुरूप हों या न हों। यह बात संविधान संपूर्ण ढांचे को समझने के लिए आवश्यक है।

सम्राट कॉन्सटेंटाइन प्रथम (शासनकाल 306 से 337 ईस्वी) ने 313 ईस्वी में 'मिलान के आदेश' (Edict of Milan) के माध्यम से ईसाई धर्म को कानूनी मान्यता देकर और बाद में इसे राजधर्म बनाकर रोमन इतिहास में एक महत्वपूर्ण युग का सूत्रपात किया ताकि वे एक सम्राट के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर सकें। उनका शासन 'टेट्रार्की' (Tetrarchy) से संक्रमण का सूचक था, जो रोमन सम्राट डायोक्लेशियन द्वारा 293 ईस्वी में स्थापित शासन की तत्कालीन प्रणाली थी, जहाँ साम्राज्य दो वरिष्ठ सम्राटों और दो कनिष्ठ सम्राटों द्वारा शासित चार भागों में विभाजित था। कॉन्सटेंटाइन के बाद रोमनों का 'संविधान' कोई एकल लिखित दस्तावेज नहीं था, बल्कि शासन की एक ऐसी प्रणाली थी जिसमें सर्वोच्च शक्ति वाला एक निरंकुश सम्राट होता था, जिसे नौकरशाही और पादरी वर्ग का समर्थन प्राप्त था और जो रोमन कानूनी परंपराओं से प्रभावित था। इस काल को 'डोमिनेट' (Dominate) के रूप में जाना जाता है, जिसमें सम्राट पूर्ण शक्ति का प्रयोग करता था और सीनेट की भूमिका मात्र औपचारिक रह गई थी। इस प्रणाली ने निम्नलिखित सुधार किए ।

रोम का यूरोप में विस्तार तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में शुरू हुआ। तथापि, इस विस्तार को महत्वपूर्ण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, रोम का सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव बना रहा, जिसने ईसाई धर्म के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया। ये धर्मांतरण अधिकतर 'ऊपर से नीचे' (top-down) की ओर थे, जो उन राजाओं द्वारा संचालित थे जो राजनीतिक लाभ चाहते थे।

पश्चिमी राजनीतिक विचार पर प्रभाव कॉन्सटेंटाइन के बाद के रोमन संविधान का पश्चिमी राजनीतिक विचार पर गहरा प्रभाव पड़ा, विशेष रूप से निम्नलिखित रूपों में:

ईसाई पादरियों का प्रभाव संधियों, पोप के आदेशों (Papal Bulls) और धार्मिक कट्टरता को लागू करने में स्पष्ट है, जो अक्सर औपनिवेशिक विस्तार, दासता और वैश्विक प्रभुत्व के विचारों के साथ जुड़े हुए थे।

ईसाई पादरी वर्ग का दासता के साथ संबंध बहुआयामी रहा है। औपनिवेशिक काल के दौरान, कई पादरी सदस्यों के पास दास थे और उन्होंने इस संस्था का समर्थन किया। कुछ पादरियों ने 'कर्स ऑफ हैम' (Curse of Ham) जैसे शास्त्रोक्त आधारों का उपयोग किया, जिसकी गलत व्याख्या यह तर्क देने के लिए की गई कि अफ्रीकी लोग दास बनने के लिए ही नियत थे।

तालमूड (Talmud) के 'ट्रैक्टेट सैनहेड्रिन' (Tractate Sanhedrin) के फोलियो 77 में आपराधिक विधि से संबंधित चर्चाएँ हैं। राबा (Raba) का एक कथन है: "यदि कोई अपने पड़ोसी को बांध देता है और वह भूख से मर जाता है, तो वह उत्तरदायी नहीं है।" पाद-टिप्पणी में इसकी व्याख्या की गई है कि उसने उसे मारा नहीं बल्कि परोक्ष रूप से उसकी मृत्यु का कारण बना। परोक्ष कार्य-कारण की यह गलत व्याख्या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, और यद्यपि यह वर्तमान न्यायिक प्रणालियों में दिखाई नहीं दे सकती, परंतु यह विचार अभी भी गुप्त समाजों, 'डीप स्टेट' (deep state) और संगठित आपराधिक गिरोहों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है।

दर्शन और पृष्ठभूमि को समझना हमारे लिए यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि यूरोपीय संविधान कैसे विकसित हुए और भारत के संदर्भ में उन अवधारणाओं को उधार लेने की क्या आवश्यकता थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि बाइबल ने यूरोपीय सभ्यता की आधारशिला रखी। पश्चिम ने पारंपरिक रूप से 'पुस्तक' का अनुसरण किया है। इन धार्मिक पुस्तकों में न केवल मनुष्यों की उत्पत्ति और उद्देश्य पर जानकारी है, बल्कि सामाजिक, न्यायिक और राजनीतिक पहलू भी सम्मिलित हैं।