अध्याय 31 · शासन की संरचना और प्रणालियाँ
पंथ निरपेक्षता और समान नागरिक संहिता
पंथनिरपेक्षता और समान नागरिक संहिता (UCC) किसी भी आधुनिक 'न्यायपूर्ण राष्ट्र' के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और परस्पर जुड़े हुए स्तंभ हैं। जहाँ पंथनिरपेक्षता राज्य और धर्म के बीच की सीमा रेखा निर्धारित करती है, वहीं समान नागरिक संहिता यह सुनिश्चित करती है कि कानून की दृष्टि में सभी नागरिक, उनके व्यक्तिगत विश्वासों की परवाह किए बिना, समान हों।
पंथनिरपेक्षता का भारतीय परिप्रेक्ष्य
पश्चिमी अवधारणा में 'सेक्युलरिज़्म' का अर्थ है राज्य और चर्च का पूर्ण पृथक्करण। इसके विपरीत, भारत के संदर्भ में इसका अर्थ 'सर्व धर्म समभाव' (सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान) रहा है। तथापि, एक आदर्श संविधान में हमें 'धर्म' और 'पंथ' के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझना होगा:
एक न्यायपूर्ण राज्य में, पंथ निरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि राज्य धर्म का विरोधी है, बल्कि यह है कि राज्य का अपना कोई 'राजकीय पंथ' नहीं है। राज्य प्रत्येक नागरिक को अपनी आध्यात्मिक यात्रा चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है, परंतु यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय अखंडता के अधीन है।
समान नागरिक संहिता: एक राष्ट्रीय आवश्यकता
समान नागरिक संहिता का अर्थ है, विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे नागरिक विषयों के लिए देश के सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू होना।
समान नागरिक संहिता की आवश्यकता के प्रमुख कारण:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामूहिक अधिकार
आलोचकों का तर्क है कि समान नागरिक संहिता धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन कर सकता है। तथापि, 'न्यायपूर्ण समाज' के सिद्धांत के अनुसार, व्यक्तिगत अधिकार सदैव सामूहिक पहचान से ऊपर होने चाहिए। धर्म व्यक्ति के अंतःकरण का विषय है, कानून का नहीं।
संविधान को यह स्पष्ट करना चाहिए कि:
चुनौतियों का समाधान
समान नागरिक संहिता को थोपा हुआ नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।
समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि भारत की 'समग्र पहचान' की दिशा में एक साहसी कदम है। यह 'अनेकता में एकता' के विचार को केवल नारों तक सीमित न रखकर, इसे संवैधानिक वास्तविकता में परिवर्तित करता है।
भाग छह : आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक भविष्य