अध्याय 33 · आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक भविष्य
राष्ट्र की चुनौतियाँ
आधुनिक युग में राज्य का प्रबंधन करना हाल के अतीत की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसके पीछे परस्पर जुड़े कई कारक हैं, जिनमें परिवहन, संचार और इंटरनेट में प्रगति के साथ-साथ तीव्र और हताश सक्रियता (activism), वैश्वीकरण, परस्पर निर्भरता और लोकतांत्रिक सरकारों में विदेशी हस्तक्षेप शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक तत्व ने शासन के परिदृश्य को बदल दिया है, जिससे नई जटिलताएं और दबाव उत्पन्न हुए हैं। नीचे विस्तार से बताया गया है कि ये कारक शासन की कठिनाइयों को कैसे बढ़ाते हैं:
1. परिवहन में प्रगति
आधुनिक परिवहन प्रणालियों ने लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही में क्रांति ला दी है। हालांकि इसने वैश्विक जुड़ाव को बढ़ाया है, लेकिन इसने राज्यों के लिए बड़ी चुनौतियाँ भी पैदा की हैं:
2. संचार और इंटरनेट में क्रांति (Revolution in Communication and the Internet)
संचार प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के प्रवाह और नागरिकों के साथ राज्य की बातचीत के तरीके को बदल दिया है:
3. तीव्र और हताश सक्रियता (Acute and Desperate Activism)
4. वैश्वीकरण (Globalisation)
वैश्वीकरण ने अर्थव्यवस्थाओं, संस्कृतियों और समाजों को परस्पर जोड़ दिया है, जिससे शासन के लिए अवसर और बाधाएं दोनों पैदा हुई हैं:
5. परस्पर निर्भरता (Interdependence)
वैश्वीकरण से गहराई से जुड़ी 'परस्पर निर्भरता' संसाधनों, सुरक्षा और स्थिरता के लिए राज्यों के बीच आपसी निर्भरता को संदर्भित करती है:
6. लोकतांत्रिक सरकारों में विदेशी हस्तक्षेप (Foreign Interference)
विदेशी हस्तक्षेप की जटिलता बढ़ गई है, विशेष रूप से लोकतांत्रिक प्रणालियों में, जो राज्य की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है:
रणनीतिक दृष्टि
किसी भी महान राष्ट्र की आधारशिला उसकी रणनीतिक दृष्टि होती है। यह दृष्टि केवल अगले चुनाव या दशक तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे आगामी 100 वर्षों की चुनौतियों और अवसरों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए। एक 'न्यायपूर्ण राज्य' (Just State) के लिए रणनीतिक दृष्टि का अर्थ है अपने दार्शनिक मूल (पुरुष) को आधुनिक वैश्विक वास्तविकताओं (प्रकृति) के साथ इस प्रकार जोड़ना कि राष्ट्र न केवल सुरक्षित रहे, बल्कि विश्व का मार्गदर्शक भी बने।
दीर्घकालिक लक्ष्य और 'अमृत काल'
राष्ट्र को अपनी प्रगति को 'खंडों' में नहीं, बल्कि 'निरन्तर' रूप में देखना चाहिए। रणनीतिक दृष्टि के मुख्य आयाम निम्नलिखित होने चाहिए:
परंपरा और तकनीक का समन्वय
भविष्य की ओर देखते हुए हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। 'रणनीतिक दृष्टि' में तकनीक का उपयोग मानवता के उत्थान के लिए होना चाहिए, न कि उसके विनाश के लिए।
वैश्विक नेतृत्व: विश्वगुरु की भूमिका
भारत की रणनीतिक दृष्टि का उद्देश्य 'अधिपत्य' (Dominance) नहीं, बल्कि 'सामंजस्य' (Harmony) होना चाहिए।
सुरक्षा और पराक्रम
शांति का आधार शक्ति है। राष्ट्र की रक्षा प्रणाली को इतना सुदृढ़ होना चाहिए कि कोई भी 'आततायी' (आक्रामक) भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का साहस न कर सके। इसमें स्वदेशी रक्षा उत्पादन और 'साइबर-युद्ध' जैसे आधुनिक क्षेत्रों में सर्वोच्चता प्राप्त करना सम्मिलित है।
रणनीतिक दृष्टि वह 'प्रकाश स्तंभ' है जो राष्ट्र की नौका को अनिश्चितता के सागर में दिशा प्रदान करता है। जब शासन 'विद्वानों' के हाथ में होगा और नीतियां 'धर्म' पर आधारित होंगी, तब राष्ट्र का उत्थान अवश्यंभावी है।